Saturday, 5 December 2015

आयुर्वेद क्या है ?


आयुर्वेद क्या है ?
आयुर्वेद माता भगवती जगत् जननी जगदम्बा जी की कृपा
एवं आशीर्वाद स्वरूप मानव के लिए दीर्घायु का वरदान है।
इसकी चर्चा चारों वेदों के एक महत्त्वपूर्ण खण्ड अथर्ववेद के
अन्दर भी पूर्णता के साथ आती है। इससे यह सिद्ध होता है कि
यह ज्ञान अति प्राचीन काल से चला आ रहा है।
हमारे पूर्वज ऋषियों ने आयुर्वेद को पांचवां वेद कहा है।
जिससे ”आयु“ अर्थात् उम्र और ”वेद“ अर्थात् ज्ञान और दीर्घायु
की प्राप्ति होती है, उसे आयुर्वेद कहते हैं। आयुर्वेद वह विद्या है,
जो मानव शरीर या अन्य पशु-पक्षियों के शरीर को स्वस्थ रखते
हुए लम्बी उम्र जीने में मदद करता है। आयुर्वेद भारत की प्राचीन
कालीन पद्धति हैं। आयुर्वेद की नींव वैदिक युग में ही पड़ चुकी
थी। हमारे पूर्वज ऋषि-मुनि इसके विशेष जानकार थे। उन्हांेने इस
चिकित्सा पद्धति पर विशेष शोध किया तथा जंगल में उगी
वनस्पतियों का परिचय अपने साधना बल से प्राप्त किया फिर
उनके गुण दोषों का विवेचन किया, नये तथ्योें को स्पष्ट
किया,उनकी उपयोग की विधि ज्ञात की और ऋषि-मुनि यह
देखकर आश्चर्य चकित रह गये कि आयुर्वेद विज्ञान (जड़ी-
बूटियां)प्रकृतिसत्ता की तरफ से मनुष्य शरीर को एक विशेष
वरदान है। इस विज्ञान के माध्यम से प्रकृति सत्ता ने मनुष्य को
पूर्ण स्वस्थ रहने की कुंजी प्रदान की है। धन्वन्तरि ऋषि का
नाम आज आयुर्वेद जगत् में पूर्ण श्रद्धा से लिया जाता है,
क्योंकि उन्हांेने ध्यान योग साधना के द्वारा एक ऐसी विधि
या सिद्धि हासिल कर ली थी कि जब वे जंगल जाते तो वहां
जड़ी-बूटियां स्वतः अपना परिचय देती थीं। वे बताती थीं कि
मेरा नाम क्या है और मेरा कौन सा अंग किस रोग को समाप्त
करने में पूर्ण समर्थ है। इसी साधना सिद्धि बल पर उन्हांेने बहुत
बड़ी रिसर्च (खोज) की और उसका विवरण उन्होंने अपने
जीवित जाग्रत् शिष्यों व पुस्तकों के माध्यम से समाज को
सौंपा। इसके अलावा इस ज्ञान को बढ़ाने में चरक ऋषि, सुश्रुत
ऋषि, वाग्भट, बंगसेन आदि अनेक ऋषियों ने आयुर्वेद में
महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
यह भारत का सौभाग्य है कि वर्तमान में अनेकों आयुर्वेद के
प्रामाणिक गं्रथ ज्यादातर छपे हुये संस्करण के रूप में उपलब्ध हैं।
परन्तु, साथ ही दुर्भाग्य भी रहा है कि कई महत्त्वपूर्ण
हस्तलिखित गं्रथ हमारी नासमझी के कारण लुप्तप्राय हो गयेे।
बचे हुए ग्रंथों में जिन्हंे कुछ प्रामाणिक ग्रंथ कह सकते हैं, वे हैं-चरक
संहिता, भावप्रकाश, सुश्रुतसंहिता, वैद्यकप्रिया,
माधवनिदान, सारंगधर संहिता, अष्टांग हृदय,
योगरत्नाकर, निघंटु, रसतंत्रसार आदि। इनमें भी अगर मूल प्रति
पहले के छपे ग्रंथ मिल सकें, इसके साथ ही कुछ ज्ञान और
आयुर्वेदिक नुस्खे जो शिष्य दर शिष्य चलते गये वे आज भी
संन्यासियों या उनके शिष्यों में अन्तर्निहित है।
आयुर्वेद के मूल सिद्धांत के अनुसार शरीर में मूल तीन-तत्त्व
वात, पित्त, कफ (त्रिधातु) हैं। अगर इनमें संतुलन रहे, तो कोई
बीमारी आप तक नहीं आ सकती। जब इनका संतुलन बिगड़ता है,
तभी कोई बीमारी शरीर पर हावी होती है। इसी सिद्धांत
को लेकर हमारे ऋषि मुनियों, आयुर्वेदज्ञों ने नुस्खों का
आविष्कार किया।
भारत में अनेकों ऐसे आयुर्वेदज्ञ पैदा हुए, जिन्होंने इस पद्धति
के द्वारा सैकड़ों रोगियों की सेवा करते हुए धन, यश, कीर्ति
प्राप्त की। आयुर्वेदिक चिकित्सा ही एक ऐसी चिकित्सा है,
जिसके माध्यम से कम खर्चे में किसी भी रोग को समूल नष्ट
किया जा सकता है।
एलोपैथिक या होमियोपैथिक चिकित्सा में तुरन्त तो आराम
मिलता है, परन्तु यह निश्चित नहीं कि रोग जड़ से खत्म हो
जायेगा। साथ ही एक परेशानी और है कि वह रोग सही हो न
हो, परन्तु लगातार दवा लेते रहने पर दूसरा कोई रोग अवश्य शरीर
में पनप जाता है। परन्तु, आयुर्वेद में ऐसा नहीं के बराबर है। आयुर्वेद
में थोड़ी देर अवश्य लगती है, परन्तु कोई नुकसान या साइड इफेक्ट
नहीं होता, वरन वह रोग जिसके लिये दवा का सेवन करते हैं
(बशर्ते दवा उसी मर्ज की बनी हो व पूर्ण प्रभावक हो), तो वह
रोग निश्चय ही समूल नष्ट होता ही है।
इन लेखों के माध्यम से हम पूर्ण प्रमाणिक, अनुभवगम्य आयुर्वेदिक
लेख व ऐसे सरल नुस्खे देने की कोशिश कर रहे हैं, जिसके बनाने में
लागत व मेहनत कम लगे। औषधि का निर्माण कोई भी आराम से
कर सके व पूर्ण लाभ ले सके । नीचे कुछ कब्ज नाशक नुस्खे दे रहे हैं
जो पूर्णतः हानिरहित व प्रामाणिक हैं और रोग को दूर करने में
सहयोगी हैं।
कब्ज रोग एवं उपचारः
कब्ज शरीर के समस्त रोगों की जड़ है। परन्तु प्रश्न यह उठता है
कि कब्ज क्या हैं ? कब्ज का संबंध पाचन क्रिया से है। जब मानव
शरीर की पाचन क्रिया बिगड़ जाती है, अर्थात् जो भोजन हम
करते हैं, वह सही ढंग से न पचना, आंतों में फंसा रह जाना, जिसकी
वजह से गैस बनना, पेट में दर्द रहना, मिचली आना, शौच जाने में
समय लगना एवं नित्य पेट साफ न होना, दिन में तीन चार बार
शौच जाना, पेट गुडगुडा़ना, बदबूदार गैस निकलना और खट्टी
डकारें आना आदि अनेकों परेशानियां पैदा हो जाती हैं, जिससे
नये-नये रोगों की उत्पत्ति होती है। मानव शरीर को जरूरी है
कि वह इन परिस्थितियों से बचे, तभी पूर्ण स्वस्थ्य रह सकते हैं।
नीचे कब्ज रोग दूर करने हेतु कुछ नुस्खे दिए जा रहे हैं, जो
प्रामाणिक एवं अनुभूत हैं-
1- त्रिफला (हर्र, बहेड़ा, आंवला) तीनों समान मात्रा में कूट
पीसकर रख लें। 3 ग्राम से 5 ग्राम तक की मात्रा रात्रि में सोते
समय गुनगुने पानी के साथ लें। लगातार कुछ दिनों तक लेने से लाभ
अवश्य देगा। साथ ही रात्रि में तांबे के पात्र में पानी रख लें एवं
सुबह उसे पी लें। इसके दस मिनट बाद शौच जायें, आराम से पेट
साफ होगा।
2- पंसारी के यहां से छोटी हरड़ ले लें। प्रतिदिन कम से कम दो
या तीन हरड़ अवश्य चूसें, चूस कर ही यह पेट में जाय। लगातार कुछ
दिन इसका प्रयोग करने पर हर तरह की कब्ज दूर  हो जाती है।
3- त्रिफला 25ग्राम, सौंफ25ग्राम, सोंठ 5ग्राम, बादाम
50ग्राम, मिश्री 20ग्राम लें और गुलाब के  फूल 50 ग्राम भी लें।
सभी को कूट-पीसकर एक शीशी में रख लें। रात्रि में सोते समय 5
से 7ग्राम तक दवा दूध या शहद के साथ लें। यह नुस्खा अपने आपमें
चमत्कारी है। इस नुस्खे से न आंतों की खुश्की का डर रहता है और
न ही कमजोरी का।
नोटः -जिन्हें कब्ज की शिकायत हो, वे ध्यान दें कि वे गरिष्ठ
चीजें, तली चीजें, उरद आदि का सेवन कम मात्रा में करें। गेहूं का
आटा भी ज्यादा महीन न पिसायें और चोकर न निकालें।
आठवां हिस्सा गेहूं में चना मिला आटे की रोटी का सेवन करें।
थोड़ा मेहनत या योग आदि जरूर करें। पानी ज्यादा से ज्यादा
पियें, पूर्ण लाभ होगा।
यह शरीर आयुर्वेद के मतानुसार त्रिधातु (बात, पित्त, कफ)
के सन्तुलन से सुचारू रूप से चलता है। जब तक यह त्रिधातु सामान्य
रूप से इस शरीर में गतिमान रहती है, तब तक यह शरीर पूर्णतः
निरोग एवं स्वस्थ रहता है, जब भी इनमें असमानता आती है तो
उसी के अनुसार शरीर में रोगों का प्रभाव दिखने लगता है। हम
इस लेख में इस शरीर के अन्दर विद्यमान त्रिधातुओं का पहला अंग
वात दोष से संबंधित जानकारी दे रहे हैैं। यह दोष विश्व के 35
प्रतिशत लोगों को प्रभावित रखता है।
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वात
आयुर्वेदिक ग्रन्थों के अनुसार वात 80 प्रकार का होता है
एवं इसी से सामंजस्य रखता हुआ एक और रोग है जिसे बाय या
वायु कहते हैं। यह 84 प्रकार का होता है। यहाँ प्रश्न यह उठता है
कि जब वात एवं वायु के इतने प्रकार हैं, तो, यह कैसे पता लगाया
जाय कि यह वात रोग है या बाय एवं यह किस प्रकार का है ?
यह कठिन समस्या है और यही कारण है कि इस रोग की उपयुक्त
चिकित्सा नहीं हो पाती है, जिससे इस रोग से पीड़ित 50
प्रतिशत व्यक्ति सदैव परेशान रहते हैं। उन्हें कुछ दिन के लिए इस
रोग में राहत तो जरूर मिलती है, परन्तु पूर्णतया सही नहीं हो
पाता है। इस रोग की चिकित्सा एलोपैथी के माध्यम से
पूर्णतया सम्भव नहीं है, जबकि आयुर्वेद के माध्यम से इसे आज कल
90 प्रतिशत तक जरूर सही किया जा सकता है, शेष 10 प्रतिशत
माँ भगवती जगत जननी की कृपा से ही सम्भव है।
वात रोग लक्षण एवं परेशानी
इस रोग के कारण शरीर के सभी छोटे-बडे़ जोडो़ं व
मांसपेशियों में दर्द व सूजन हो जाती है। गठिया में शरीर के
एकाध जोड़ में प्रचण्ड पीड़ा के साथ लालिमायुक्त सूजन एवं
बुखार तक आ जाता है। यह रोग शराब व मांस प्रेमियों को
सामान्य व्यक्तियों की अपेक्षा जल्दी पकड़ता है। यह धीरे-
धीरे शरीर के सभी जोड़ों तक पहुँचता है। संधिवात उम्र बढ़ने के
साथ मुख्यतः घुटनों एवं पैरों के मुख्य जोड़ों को क्रमशः अपनी
गिरफ्त में लेता हैं।
वात रोग की शुरूआत धीरे-धीरे होती है। शुरू में सुबह उठने पर
हाथ पैरों के जोडा़ें में कड़ापन महसूस होता है और अंगुलियाँ
चलाने में परेशानी होती है। फिर इनमें सूजन व दर्द होने लगता है
और अंग-अंग दर्द से ऐंठने लगता है जिससे शरीर में थकावट व
कमजोरी महसूस होती है। साथ ही रोगी चिड़चिड़ा हो
जाता है। इस रोग की वजह सेे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम
पड़ जाती है। इसी के साथ छाती में इन्फेक्शन, खांसी, बुखार
तथा अन्य समस्यायें उत्पन्न हो जाती है। साथ ही चलना
फिरना रुक जाता है।
इन सबसे खतरनाक कुलंग वात होता है। यह रोग कुल्हे, जंघा
प्रदेश एवं समस्त कमर को पकड़ता है एवं रीढ़ की हड्डी को
प्रभावित करता है। इस रोग में तीव्र चिलकन (फाटन) जैसा
तीव्र दर्द होता है और रोगी बेचैन हो जाता है, यहाँ तक कि
इसमें मृत्यु तुल्य कष्ट होता है। यह रोग की सबसे खतरनाक स्टेज
होती हैै। इस का रोगी दिन-रात दर्द से तड़पता रहता है और कुछ
समय पश्चात् चलने-फिरने के काबिल भी नहीं रह जाता है। वह
पूर्णतया बिस्तर पकड़ लेता है और चिड़चिड़ा हो जाता है।
रोग से छुटकारा
इस रोग से छुटकारा पाने हेतु कुछ सरलतम आयुर्वेदिक नुस्खे एवं
तेल का विवरण नीचे दे रहे हैं, जो पूर्ण परीक्षित योग हैं। ये नुस्खे
90 प्रतिशत रोगियों को फायदा करते हैं। शेष 10 प्रतिशत अपने
पिछले कर्मों की वजह से दुख पाते हैं, जिसमें दवा कार्य नहीं
करती। उसमें मात्र माता आदिशक्ति जगत् जननी भगवती दुर्गा
जी एवं पूज्य गुरुदेव जी की कृपा ही रोग को दूर कर पाती है।
यद्यपि ये नुस्खे परीक्षित हैं, परन्तु अपने चिकित्सक की देख रेख
में लेंगे तो ज्यादा अच्छा होगा। दवा खाने की मात्रा रोग के
अनुसार कम या ज्यादा दी जा सकती है।
एक बात ध्यान रखें कि जो जड़ी-बूटी औषधि रूप में आप उपयोग
करें, वह पूर्णत: सही एवं ताजी हो। उसमें कीड़े न लगे हों, ज्यादा
पुरानी न हो और साफ सुथरी हो, उन्ही दवाइयों के मिश्रण
का उपयोग करें, लाभ अवश्य होगा।
(1) वातान्तक बटीः-
सोंठ,सुहागा,सोंचर गांधी,सहिजन के संग
गोली बांधी।
80वात 84बाय कहै धनवन्तरि तड़ से
जाये।।
सोंठ 50 ग्राम, सुहागा 50 ग्राम, सोंचर (काला नमक) 50
ग्राम, गांधी(हींग) 50 ग्राम, सहिजन (मुनगा) की छाल का रस
आवश्यकतानुसार, सबसे पहले कच्चे सुहागे को पीसकर आग में लोहे
के तवे पर डालकर उसे भून लें। वह लाई की तरह फूल जायेगा, फूला
हुआ सुहागा ही काम में लें। सोंठ, सुहागा एवं काला नमक को
कूट-पीसकर एक थाली में डाल लें। फिर दूसरे बर्तन में सहिजन की
छाल का रस लें हींग घोल लें। और उसमें जब हींग घुल जाये तो
सहिजन की छाल का रस कुछ दूधिया हो जायेगा। उसमें कुटा-
पिसा, सोंठ, काला नमक व सुहागा का पाउडर मिला लें। फिर
उसकी चने के आकार की गोली बना लें और छाया में सुखाकर
बन्द डिब्बे में रख लें। फिर सुबह-दोपहर-शाम दो-दो गोली नाश्ते
या खाने के बाद सादा पानी से लें। आपको आराम 10 दिन में
ही मिलने लगेगा। कम से कम 30 दिन यह गोलियां लगातार
अवश्य खायें तभी पूर्ण लाभ हो पायेगा। यह नुस्खा कई बार का
परीक्षित है। इस दवा के द्वारा बवासीर के रोगी को भी
अवश्य लाभ मिलता है।
(2) वात नासक चूर्णः-
चन्दसूर 50 ग्राम, मेथी 50 ग्राम, करैल 50 ग्राम, अचमोद 50
ग्राम, इन चारों दवाओं को कूट-पीसकर ढक्कन वाले डिब्बे में
रखें। सुबह नाश्ते के बाद एक चम्मच चूर्ण गुनगुने पानी के साथ लें
एवं रात्रि में भोजन के बाद गुनगुने दूध के साथ एक चम्मच लें। यह
दवा भी कम से कम 60 दिन लें। निश्चय ही आराम मिलता है।
(3) कुलंगवात (साइटिका)-
मीठा सुरंजान 50 ग्राम, बड़़ी हरड़ का छिलका 50 ग्राम,
पठानी लोंध 50 ग्राम, मुसब्बर 50 ग्राम। इन चारों को कूट-
पीसकर डिब्बे में रख लें। इस दवा का एक चम्मच पाउडर पानी के
साथ लें। यह दवा कम से कम 60 दिन तक लें या जब तक पूर्ण लाभ
न मिल जाये तब तक लें। इसके खाने से दस्त लग सकते हैं। चिन्ता न
करें, न ही दवा बन्द करें, दस्त अपने आप बन्द हो जायेगा एवं रोग
भी निर्मूल हो जायेगा, दस्त लगने पर दवा की मात्रा कुछ घटा
लें।
परहेजः - चावल, बैगन, कद्दू, बेसन या चने की बनी कोई वस्तु न
खायें तथा तली चीजें या बादी चीजें भी न लें।
(4) वातनाशक काढ़ाः -
हरसिंगार के हरे पत्ते 20 नग को अधकुचला कर 300 ग्राम
पानी में डालकर धीमी आँच में पकायें। जब पानी 50 ग्राम रह
जाये, तो आग से उतार लें और कपड़े से छानकर दो खुराक बनायें
एक खुराक सुबह नास्ता के पहले गरम-गरम पी लें एवं दूसरी खुराक
शाम को आग में हल्का गरम कर पी लें। प्रतिदिन नया काढ़ा
ऊपर लिखी विधि से बनायें और सुबह शाम पियें। यह क्रिया 30
दिन लगातार करें। वात रोग में निश्चय ही आराम होगा।
(5) गठिया(संधिवात)ः -
आँवला चूर्ण 20 ग्राम, हल्दी चूर्ण 20 ग्राम, असंगध चूर्ण 10
ग्राम, गुड़ 20 ग्राम इन चारों औषधियों को 500 ग्राम पानी में
डालकर धीमी आँच में पकाये, जब पानी 100 ग्राम रह जाये तो
उसे आग से उतार कर कपड़े या छन्नी से छान लें एवं इस काढ़े की
तीन खुराक बनायें। सुबह, दोपहर एवं रात्रि में खाने के बाद पियें।
इस प्रकार प्रतिदिन सुबह यह दवा बनायें, लगातार 30 दिन पीने
पर गठिया में निश्चित रूप से आराम होता है।
परहेज-ज्यादा तली हुईं, खट्टी, गरिष्ठ चीजें व चावल आदि दवा
सेवन के समय न लंे।
(6) गठिया की दवाः-
सुरंजान 30ग्राम, चोवचीनी 30ग्राम, सोठ 30ग्राम, पीपर
मूल 30ग्राम, हल्दी 30ग्राम, आँवला 50ग्राम, इन सब को कूट-
पीसकर चूर्ण बनायें और उसमें 100ग्राम गुड़ मिलाकर रख लें।
प्रतिदिन सुबह एवं शाम को 10ग्राम दवा में 10ग्राम शहद
मिलाकर खायें। सुबह हल्का नाश्ता करने एवं राात्रि में खाना
खाने के बाद ही दवा लें। यह दवा लगातार 30दिन लेने से गठिया
वात जरूर सही होगा।
परहेज-खट्टी चीजें, गरिष्ठ चीजें, चावल आदि न लें।
(7) वातनाशक तेलः -
100ग्राम तारपीन का तेल, 30ग्राम कपूर, 10ग्राम
पिपरमिण्ट, इन सबको मिलाकर धूप में एक दिन रखें। जब यह सब
तारपीन में मिल जाये, तो दवा तैयार हो गई। जिन गाठों में दर्द
हो, वहां पर यह दवा लगाकर धीरे-धीरे 15मिनट तक मालिश करें
और इसके बाद कपड़ा गरम करके उस स्थान की सिकाई कर दें। एक
सप्ताह में ही दर्द में आराम मिलने लगेगा।
(8) वात हेतु तेलः -
500ग्राम सरसांे का तेल (कडुआ तेल), 10ग्राम मदार का दूध,
50ग्राम करील की जड़ का बकला, 1 काला धतूरा का एक फल,
50ग्राम अमरबेल, लाजवन्ती पंचमूल 50ग्राम, 5ग्राम तपकिया
हरताल, कुचला 2नग, इन सब को अधकुचला करके तेल में पकायें। जब
ये सब दवायें जल जायें तो तेल उतार लें। इस तेल को गांठो में मलें
एवं धूप सेंक करें या तेल लगाकर आग से सेकंे। दो या तीन दिनों में
यह अपना लाभ दिखायेगा, यह तेल कुलंग बात के लिये भी
पूर्णतया लाभदायक है।
नोट-यह तेल जहरीला बनता है। इसलिये इसे आँखों से दूर रखें।
आँखों में लगने से पानी निकलने लगता है। इसे गांठों में लगाकर
हाथ साबुन से धो लें।
(9) वायगोला का दर्दः -
सफेद अकौवा (मदार), इसे स्वेतार्क भी कहते है। इसका एक
फूल को गुड़ में लपेटकर रोगी को खिलाकर पानी पिला दें,
आधा घंटे में ही रोगी का दर्द सही हो जायेगा।
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पित्त
यह स्पर्श और गुण में उष्ण होता है, अर्थात् अग्नि रूप होता है
एवं द्रव (तरल) रूप में रहता है। इसका वर्ण पीला एवं नीला होता
है। यह सत्त्वगुण प्रधान होता है, रस में कटु (चरपरा) और तिक्त
(कड़वा) होता है तथा दूषित होने पर खट्टा हो जाता है।
पित्त प्रकृति के लक्षण
पित्त प्रकृति मनुष्य के बाल समय से पहले ही श्वेत हो जाते हैं,
परन्तु वह बुद्धिमान् होता है। उसे पसीना अधिक आता है। उसके
स्वभाव में क्रोध अधिक होता है और इस तरह का मनुष्य
निद्रावस्था में चमकीली चीजें देखता है।
पित्त के स्थान एवं कार्य
अग्नाशय (पक्वाशय के मध्य) में अग्नि रूप (पाचक रूप)
परिमाण की स्थिति में रहता है। इसको पाचक पित्त कहते हैं।
यह चतुर्दिक आहार को पचाता है। इसका वर्णन इस प्रकार भी
किया जा सकता है:
त्वचा (चमड़ी) में जो पित्त रहता है, वह त्वचा में कांति
(प्रभा)की उत्पत्ति करता है और शरीर की वाह्य त्वचा पर
लगाये हुये लेप और अभ्यंग को पचाता (शोषण करता) है। यह शरीर
के तापमान को स्थिर रखता है। इसको श्राजक पित्त कहते हैं।
जो पित्त दोनों नेत्रों में रहकर (कृष्ण-पीतादि)रूपोें का
ज्ञान देता हैै, उसको आलोचक (दिखाने वाला) पित्त कहते है।
जो पित्त हृदय में रहकर मेधा (धारणाशक्ति) और प्रज्ञा (बुद्धि)
को देता है, वह ‘साधक’ पित्त होता है।
इस प्रकार नाम और कर्म भेद से पित्त पाँच प्रकार का होता
है। और यही पित्त समग्र शरीर को उत्तम रखने का कारण है।
पित्त रोग वर्णन
अब पित्त से होने वाले 40 रोगों का वर्णन किया जाता
है:
1. धूमोद्वार - ( डकार से निकलने वाली वायु धंुए सा प्रतीत
होता है )।
2. विदाह - ( इसमें हाथ, पांव, नेत्रादि में जलन होती है )।
3. उष्णाड्डत्व - ( शरीर के अंगों का गरम रहना )।
4. मतिभ्रम - ( पित्त की अत्यधिक वृद्धि से बुद्धि श्रमित
हो जाती है )।
5. कांति हानि - ( शरीर के वर्ण में मलिनतायुक्त पीत वर्ण
का बोध होना )।
6. कंठ शोष - ( कंठ का सूखना )।
7. मुख शोष - ( मुख का सूखना )।
8. अल्प शुक्रता - ( वीर्य का अल्प होना )।
9. तिक्तास्यता - ( मुख का स्वाद कड़वा रहना )।
10. अम्लवक्त्रता - ( मुख का स्वाद खट्टा सा रहे )।
11. स्वेदस्त्राव - ( पसीने का अधिक आना )।
12. अंग पाक - ( पित्ताधिक्य के कारण शरीर का पक
जाना )।
13. क्मल - ( परिश्रम के बिना ही थकावट का होना )।
14. हरितवर्णत्व - ( पित्त के मलयुक्त होने पर हरा सा वर्ण
होता है )।
15. अतृप्ति - ( भोजनादि में तृप्ति नहीं होती )।
16. पीत गात्रता - ( अंगों का पीला होना )।
17. रक्त स्त्राव - ( रुधिर प्रवृत्ति )।
18. अंग दरण - ( अंगों में दरण्वत पीड़ा )।
19. लोह गन्धास्यता- ( निःश्वसित श्वास में लोहे की गन्ध
का होना )।
20. दौर्गान्ध्य - ( पसीने में दुर्गन्ध का आना )।
21. पीतमूत्रता - ( मूत्र का पीत वर्ण होना )।
22. अरति - ( बेचैनी का होना )।
23. पीत विट्कता - ( पुरीष का पीत होना )।
24. पीतावलोकन - ( पीला ही पीला दिखना )।
25. पीत नेत्रता - ( नेत्रों का पीला होना )।
26. पीत दन्तता - ( दांतांे का पीला होना )।
27. शीतेच्छा - ( शीतल पदार्थ और शीतल वायु की
अभिलाषा सर्वदा होना )।
28. पीतनखता - ( नाखूनों का पीला होना )।
29. तेजो द्वेष - ( अत्यंत चमकीली वस्तुओं से द्वेष )।
30. अल्पनिद्रा - ( थोड़ी निद्रा का आना )।
31. कोप - ( क्रोधी स्वभाव का होना )।
32. गात्रसाद - ( अं्रगों में द्रढता का अभाव )।
33. भिलविट्कता - ( पुरीष का द्रव रूप में आना )।
34. अन्धता - ( नेत्र ज्योति का हृास )।
35. उष्णोच्छवास - ( वायु का गरम होकर आना )।
36. उष्ण मूत्रता - ( मूत्र का गरम होना )।
37. उष्ण मानता - ( मल का स्पशौषणा होना )।
38. तमसोदर्शन - ( अन्धकार का दिखना )।
39. पीतमण्डल दर्शन - ( पीले मण्डलों का दिखना )।
40. निःसहत्व - ( सहन शक्ति का अभाव होना )।
इस प्रकार पित्त जनित ये 40 रोग हैः
पित्त प्रकोप एवं शमन
विदाहि ( वंश, करीरादि पित्त प्रकोपक ), कटु (तीक्ष्ण),
अम्ल (खट्टे) एवं अत्युष्ण भोजनों (खानपानादि) के सेवन से,
अत्यधिक धूप अथवा अग्नि सेवन से, क्षुधा और प्यास के रोकने
से, अन्न के पाचन काल में, मध्याह्न में और आधी रात के समय
उपरोक्त कारणों से पित्त का कोप ( पित्त का दुष्ट ) होता है।
इन कारणों के विपरीत (उल्टा) आचरण करने से और विपरीत
समयों में पित्त का शमन होता है।
पित्तजनित दोषों को दूर करने हेतु औषधि
1- शतावरी का रस दो तोला में मधु पांच ग्राम मिलाकर पीने
से पित्त जनित शूल दूर होता है।
2- हरड,़ बहेड़ा, आंवला, अमलतास की फली का गूदा, इन चारों
औषधियों के काढे़ में खांड़ और शहद मिलाकर पीने से रक्तपित्त
और पित्तजनित शूल (नाभिस्थान अथवा पित्त और पित्तजनित
शूल ) नाभिस्थान अथवा पित्त वाहिनियों में पित्त संचित
और अवरुद्ध होने से उत्पन्न होने वाले शूल को अवश्य दूर करता है।
नोट- काढ़ा बनाने हेतु दवा के मिश्रण से 16 गुना पानी डालकर
मंद आंच में पकायें। जब पानी एक चौथाई रह जाये, तो उसे ठंडा
करके पीना चाहिये। इस काढ़ा की मात्रा चार तोला के
आसपास रखनी चाहिए।
3- पीपल (गीली) चरपरी होने पर भी कोमल और शीतवीर्य होने
से पित्त को शान्त करती है।
4- खट्टा आंवला, लवण रस और सेंधा नमक भी शीतवीर्य होने से
पित्त को शान्त करती है।
5- गिलोय का रस कटु और उष्ण होने पर भी पित्त को शान्त
करता है।
6- हरीतकी (पीली हरड़) 25 ग्राम, मुनक्का 50 ग्राम, दोनों
को सिल पर बारीक पीसकर उसमें 75 ग्राम बहेड़े का चूर्ण
मिला लें। चने के बराबर गोलियां बनाकर प्रतिदिन
प्रातःकाल ताजा जल से दो या तीन गोली सेवन करें। इसके
सेवन से समस्त पित्त रोगों का शमन होता है। हृदय रोग, रक्त के
रोग, विषम ज्वर, पाण्डु-कामला, अरुचि, उबकाई, कष्ट, प्रमेह,
अपरा, गुल्म आदि अनेक ब्याधियाँ नष्ट होती हैं।
7- 10 ग्राम आंवला रात्रि में पानी में भिगो दें। प्रातःकाल
आंवले को मसलकर छान लें। इस पानी में थोड़ी मिश्री और जीरे
का चूर्ण मिलाकर सेवन करें। तमाम पित्त रोगों की रामबाण
औषधि है। इसका प्रयोग 15-20 दिन करना चाहिए।
8- शंखभस्म 1ग्राम, सोंठ का चूर्ण आधा ग्राम, आँवला का चूर्ण
आधा ग्राम, इन तीनों औषधियों को शहद में मिलाकर सुबह
खाली पेट एवं शाम को खाने के एक घण्टे बाद लेने से अम्लपित्त
दूर होता है।
नोट- वैसे तो सभी नुस्खे पूर्णतः निरापद हैं, परन्तु फिर भी इन्हें
किसी अच्छे वैद्य से समझकर व सही दवाओं का चयन कर उचित
मात्रा में सेवन करें, तो ही अच्छा रहेगा। गलत रूप से किसी दवा
का सेवन नुकसान दायक भी हो सकता है। ऐसी स्थ्तिि में लेखक
जिम्मेदार नही होंगे।
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कफ
यह शरीर आयुर्वेद के मतानुसार त्रिधातु में बंटा है जब तक
शरीर में त्रिधातु (बात, पित्त, कफ) समानता की स्थिति में
रहत है, वह स्वस्थ रहता है। किन्तु, उनकी असामानता की
स्थिति में अनेकों रोगों का जन्म होता है, इस बार हम त्रिधातु
के तीसरे अंग कफ के बारे में जारकारी दे रहें हैैं। कफ चिकना,
भारी, सफेद, पिच्छिल (लेसदार) मीठा तथा शीतल(ठंडा)
होता हैं। विदग्ध(दूषित) होने पर इसका स्वाद नमकीन हो
जाता है। कफ से सम्बन्धित तकलीफ लगभग 31 प्रतिशत लोगों
को रहती है।
कफ के स्थान, नाम और कर्म
आमाशय में, सिर (मस्तिष्क) में, हृदय में और
सन्धियों (जोड़ों) में रहकर शरीर की स्थिरता और पुष्टि को
करता है।
1- जो कफ आमाशय में अन्न को पतला करता है, उसे क्लेदन कहते
हैं।
2- जो कफ मूर्धि (मस्तिष्क) में रहता है, वह ज्ञानेन्द्रियों को
तृप्त और स्निग्ध करता है। इसलिए
उसको स्नेहन कफ कहते हैं।
3- जो कफ कण्ठ में रहकर कण्ठ मार्ग को कोमल और मुलायम
रखता है तथा जिव्हा की रस ग्रन्थियों को क्रियाशील
बनाता है और रस व ज्ञान की शक्ति उत्पन्न करता है,उसको
रसन कफ कहते हैं।
4- हृदय में (समीपत्वेन उरःस्थित)रहने वाला कफ अपनी
स्निग्धता और शीतलता से सर्वदा हृदय की रक्षा करता है।
अतः उसको अवलम्बन कफ कहते हैं।
5- सन्धियों (जोड़ों) में जो कफ रहता है, वह उन्हें सदा चिकना
रखकर कार्यक्षम बनाता है। उसको संश्लेष्मक कफ कहते है।
कफ जनित रोग
1- तन्द्रा
2- अति निद्रा
3- निद्रा
4- मुख का माधुर्य - मुख के स्वाद का मीठा होना
5- मुख लेप - मुख का कफ से लिप्त रहना
6- प्रसेतका - मुख से जल का श्राव होना
7- श्वेत लोकन - समस्त पदार्थो का सफेद दिखना
8- श्वेत विट्कता - पुरीष का श्वेत वर्ण होना
9- श्वेत मूत्रता - मूत्र के वर्ण का श्वेत होना
10- श्वेतड़वर्णता - अंगो के वर्ण का श्वेत होना
11- शैत्यता - शीत प्रतीति
12- उष्णेच्छा - उष्ण पदार्थ और उष्णता की इच्छा
13- तिक्त कामिता - कड़वे और तीखे पदार्थांे की अभिलाषा
14- मलाधिक्य - मल की अधिकता
15- बहुमूत्रता - मूत्र का अधिक आना
16- शुक्र बहुल्यता - वीर्य की अधिकता
17- आलस्य - आलस्य अधिक आना
18- मन्द बुद्धित्व - बुद्धि की मन्दता
19- तृप्ति - भोजनेच्छा का अभाव
20- घर्घर वाक्यता - वर्णांे के स्पष्टोचारण का अभाव तथा
जड़ता।
कफ प्रकोप और शमन -
मधुर (मीठा), स्निग्ध (चिकना), शीतल (ठंडा)
तथा गुरु पाकी आहारों के सेवन से प्रातःकाल में भोजन करने के
उपरान्त में परिश्रम न करने से श्लेष्मा (कफ) प्रकुपित होता है और
उपरोक्त कारणों के विपरीत आचरण करने से शान्त होता है।
कफ प्रकृति के लक्षण-
कफ प्रकृति मनुष्य की बुद्धि गंभीर होती है।
शरीर मोटा होता है तथा केश चिकने होते हैैं। उसके शरीर में बल
अधिक होता हैंे, निद्रावस्था में जलाशयों (नदी, तालाब
आदि) को देखता है, अथवा उसमें तैरता है।
कफ रोग निवारक दवायें
1-सर्दी व जुका म
o-काली मिर्च का चूर्ण एक ग्राम सुबह खाली
पेट पानी के साथ प्रतिदिन लेते रहने से सर्दी जुकाम की
शिकायत दूर होती है।
o- दो लौंग कच्ची, दो लौंग भुनी हुई को पीसकर शहद में
मिलाकर सुबह खाली पेट एवं रात्रि में खाने के आधा घंटे के बाद
लें, कफ वाली खांसी में आराम आ जायेगा।
2- श्वासनाशक कालीहल्दी
कालीहल्दी को पानी में घिसकर एक चम्मच लेप
बनायंे। साथ ही एक चम्मच शहद के साथ सुबह खाली पेट दवा
नित्य 60 दिन खाने से दमा रोग में आराम हो जाता है।
3- कफ पतला हो तथा सूखी खांसी सही हो
शिवलिंगी, पित्त पापड़ा, जवाखार, पुराना
गुड़, यह सभी बराबर भाग लेकर पीसें और जंगली बेर के बराबर
गोली बनायें। एक गोली मुख में रखकर उसका दिन में दो तीन
बार रस चूसंे। यह कफ को पतला करती है, जिससे कफ बाहर
निकल जाता है तथा सूखी खांसी भी सही होती है।
4- दमा रोग
20 ग्राम गौमूत्र अर्क में 20 ग्राम शहद मिलाकर
प्रतिदिन सुबह खाली पेट 90 दिन तक पीने से दमा रोग में आराम
हो जाता है। इसे लगातार भी लिया जा सकता है, दमा,
टी.वी. हृदय रोग एवं समस्त उदर रोगों में भी लाभकारी है।
5- कुकुर खांसी
धीमी आंच में लोहे के तवे पर बेल की पत्तियों
को डालकर भूनते-भूनते जला डालें। फिर उन्हें पीसकर ढक्कन बन्द
डिब्बे में रख लें और दिन में तीन या चार बार सुबह, दोपहर, शाम
और रात सोते समय एक माशा मात्रा में 10 ग्राम शहद के साथ
चटायें, कुछ ही दिनों के सेवन से कुकुर खांसी ठीक हो जाती हैै।
यह दवा हर प्रकार की खांसी में लाभ करती है।
6- गले का कफ
पान का पत्ता 1 नग, हरड़ छोटी 1 नग, हल्दी
आधा ग्राम, अजवायन 1 ग्राम, काला नमक आवश्यकतानुसार,
एक गिलास पानी में डालकर पकायें आधा गिलास रहने पर गरम-
गरम दिन में दो बार पियें । इससे कफ पतला होकर निकल
जायेगा। रात्रि में सरसों के तेल की मालिश गले तथा छाती व
पसलियांे में करें।
7- खांसी की दवा-
भूरी मिर्च 5 ग्राम, मुनक्का बीज निकला 20
ग्राम, मिश्री 20 ग्राम, छोटी पीपर 5 ग्राम तथा छोटी
इलायची 5 ग्राम, इन सभी को पीसकर चने के बराबर गोली
बना लें। सुबह एक गोली मुँह में डाल कर चूसें। इसी तरह दोपहर और
शाम को भी चूसें। कफ ढ़ीला होकर निकल जाता है और खांसी
सही हो जाती है।
8- गला बैठना
दिन में तीन या चार बार कच्चे सुहागे की चने
बराबर मात्रा मुंह में डालकर चूसें। गला निश्चित ही खुल जाता
है और मधुर आवाज आने लगती है। गायकों के लिए यह औषधि
अति उत्तम है।
9- श्वास
पीपल की छाल को रविपुष्य या गुरुपुष्य के दिन
सुबह न्यौता देकर तोड़ लाएं और सुखाकर रख लें। माघ पूर्णिमा
को बारह बजे रात में कपिला गाय के दूध में चावल की खीर
बनाकर उसमें एक चुटकी दवा डाल लें और चांदनी रात में तीन घंटे
रखकर मरीज को खिलाएं श्वास रोग के लिए अत्यंत लाभकारी
है।
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सैकड़ों बीमारियों की जड़ पेट के कीडे़
इस सम्पूर्ण सृष्टि में मानव शरीर सर्वश्रेष्ठ है। इसलिए हर
प्रकार से हमें इसकी रक्षा करनी चाहिये। परन्तु, मानव अपनी
क्षणिक मानसिक तृप्ति के लिये तरह-तरह के सडे़-गले व्यंजन जो
शरीर के लिये हानिकारक हैं, खाता रहता है। इससे शरीर में
अनेकों तरह के कीडे़ पैदा हो जाते हैैं और यही शरीर की अधिकतर
बीमारियों के जनक बनते हैैं। ये कीडे़ दो तरह के होते हैं। प्रथम,
बाहर के कीडे़ और द्वितीय, भीतर के कीडे़। बाहर के कीडे़ सर में
मैल और शरीर में पसीने की वजह से जन्मते हैं, जिन्हंे जूँ, लीख और
चीलर आदि नामों से जानते हैं। अन्दर के कीड़े तीन तरह के होते
हैं। प्रथम पखाने से पैदा होते हैैं, जो गुदा में ही रहते हैं और गुदा
द्वार के आसपास काटकर खून चूसते हैं। इन्हे चुननू आदि अनेकों
नामों से जानते हैं। जब यह ज्यादा बढ़ जाते हैं, तो ऊपर की ओर
चढ़ते हैं, जिससे डकार में भी पखाने की सी बदबू आने लगती है।
दूसरे तरह के कीडे़ कफ के दूषित होने पर पैदा होते हैं, जो छः तरह
के होते हैं। ये आमाशय में रहते हैं और उसमें हर ओर घूमते है। जब ये
ज्यादा बढ़ जाते हैं, तो ऊपर की ओर चढ़ते हैं, जिससे डकार में भी
पखाने की सी बदबू आने लगती है। तीसरे तरह के कीडे़ रक्त के
दूषित होने पर पैदा हो सकते हैं, ये सफेद व बहुत ही बारीक होते हैं
और रक्त के साथ-साथ चलते हुये हृदय, फेफडे़, मस्तिष्क आदि में
पहुँचकर उनकी दीवारों में घाव बना देते हैं। इससे सूजन भी आ
सकती है और यह सभी अंग प्रभावित होने लगते हैं। इनके खून में ही
मल विसर्जन के कारण खून भी धीरे-धीरे दूषित होने लगता है,
जिससे कोढ़ जनित अनेकों रोग होने का खतरा बन जाता है।
एलोपैथिक चिकित्सा के मतानुसार अमाशय के कीड़े खान-
पान की अनियमितता के कारण पैदा होते हैं,जो छः प्रकार के
होते है। 1- राउण्ड वर्म 2- पिन वर्म 3- हुक वर्म 5-व्हिप वर्म 6-
गिनी वर्म आदि तरह के कीडे़ जन्म लेते हैं।
कीडे़ क्यों पैदा होते हैं बासी एवं मैदे की बनी चीजें अधिकता
से खाने, ज्यादा मीठा गुड़-चीनी अधिकता से खाने, दूध या दूध
से बनी अधिक चीजें खाने, उड़द और दही वगैरा के बने व्यंजन
ज्यादा मात्रा में खाने, अजीर्ण में भोजन करने, दूध और दही के
साथ-साथ नमक लगातार खाने, मीठा रायता जैसे पतले पदार्थ
अत्यधिक पीने से मनुष्य शरीर में कीडे़ पैदा हो जाते हैं।
कीडे़ पैदा होने के लक्षण एवं बीमारियाँ शरीर के अन्दर मल,
कफ व रक्त में अनेकों तरह के कीडे़ पैदा होते हैं। इनमें खासकर बड़ी
आंत में पैदा होने वाली फीता कृमि (पटार) ज्यादा खतरनाक
होती है। जो प्रत्येक स्त्री-पुरूष व बच्चों के पूरे जीवनकाल में
अनेकों बीमारियों केा जन्म देती हैं, जो निम्नवत है:
1- आंतांे में कीड़ों के काटने व उनके मल विसर्जन से सूजन आना,
पेट में हल्का-हल्का दर्द, अजीर्ण, अपच, मंदाग्नि, गैस, कब्ज
आदि का होना।
2- शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ना, जिससे
अनेकों रोगों का आक्रमण ।
3- बड़ों व बच्चों में स्मरण शक्ति की कमी, पढ़ने में मन न लगना,
कोई बात याद करने पर भूल जाना।
4- नींद कम आना, सुस्ती, चिड़चिड़ापन, पागलपन, मिर्गी, हाथ
कांपना, पीलिया रोग आदि होना।
5- पित्ती, फोड़े, खुजली, कोढ़, आँखों के चारों ओर सूजन, मुँह में
झंाई, मुहांसे आदि होना।
6- पुरुषों में प्रमेह, स्वप्नदोष, शीघ्रपतन, बार-बार पेशाब जाना
आदि।
श्7-स्त्रियों की योनि से सफेद पदार्थ बराबर निकलना,
श्वेतप्रदर, रक्तप्रदर आदि।
8- बार-बार मुँह में पानी आना, अरुचि तथा दिल की धड़कन
बढ़ना, ब्लडप्रेशर आदि।
9- ज्यादा भूख लगना, बार-बार खाना, खाने से तृप्ति न होना,
पेट निकल आना।
10- भूख कम लगना, शरीर कमजोर होना, आंखो की रोशनी
कमजोर होना।
11- अच्छा पौष्टिक भोजन करने पर भी शरीर न बनना क्योंकि
पेट के कीड़े आधा खाना खा जाते है।
12- फेफड़ो की तकलीफ, सांस लेने में दिक्कत, दमा की
शिकायत, एलर्जी आदि।
13- बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक विकास में कमी आना।
14- बच्चों का दांत किटकिटाना, बिस्तर पर पेशाब करना,
नींद में चौंक जाना, उल्टी होना।
15- आंतो में कीड़ो के काटने पर घाव होने से लीवर एवं बड़ी आंत
में कैंसर होने का खतरा। (कैंसर के जीवाणु खाना के साथ लीवर
व आंत में पहुँचकर कीड़ो के काटने से हुए घाव में सड़न पैदा कर कैंसर
का रूप ले लेते हैं)
ये कीड़े संसार के समस्त स्त्री-पुरुष व बच्चों में पाये जाते है।
यह छोटे-बडे 1 सेन्टीमीटर से 1मीटर तक लम्बे हो सकते हैं एवं
इनका जीवनकाल 10से12वर्ष तक रहता है। यह पेट की आंतो को
काटकर खून पीते है जिससे आंतो में सूजन आ जाती है। साथ ही
यह कीड़े जहरीला मल विसर्जित भी करते हैं जिससे पूरा पाचन
तंत्र बिगड़ जाता है। यह जहरीला पदार्थ आंतो द्वारा खींचकर
खून में मिला दिया जाता है जिससे खून में खराबी आ जाती है।
यही दूषित खून पूरे शरीर के सभी अंगों जैसे हृदय, फेफड़े, गुर्दे,
मस्तिष्क आदि में जाता है जिससे इनका कार्य भी बाधित
होता है और अनेक रोग जन्म ले लेते हैं। शरीर की रोग प्रतिरोधक
क्षमता कमजोर पड़ जाती है और अनेक रोग हावी हो जाते हैं।
इसलिए प्रत्येक मनुष्य को प्रतिवर्ष कीड़े की दवा जरूर लेनी
चाहिए। एलोपैथिक दवाओं में ज्यादातर कीड़े मर जाते हैं, परन्तु
जो ज्यादा खतरनाक कीड़े होते हैं, जैसे- गोलकृमि, फीताकृमि,
कद्दूदाना आदि, जिन्हें पटार भी कहते हैं, वे नहीं मरतें हैं। इन
कीड़ों पर एलोपैथिक दवाओं को कोई प्रभाव नहीं पडता है,
इन्हें केवल आयुर्वेदिक दवाओं से ही खत्म किया जा सकता है। ये
कीड़े मरने के बाद फिर से हो जाते हैं। इसका कारण खान-पान
की अनियमितता है। मनुष्य को स्वस्थ रहने के लिये प्रत्येक वर्ष
कीड़े की दवा अवश्य खानी चाहिये।
कृमि रोग की चिकित्सा
1- बायबिरंग, नारंगी का सूखा छिलका, चीनी(शक्कर) को
समभाग पीसकर रख लें। 6ग्राम चूर्ण को सुबह खाली पेट सादे
पानी के साथ 10दिन तक प्रतिदिन लें। दस दिन बाद कैस्टर
आयल (अरंडी का तेल) 25ग्राम की मात्रा में शाम को रोगी
को पिला दें। सुबह मरे हुए कीड़े निकल जायेंगे।
2- पिसी हुई अजवायन 5ग्राम को चीनी के साथ लगातार
10दिन तक सादे पानी से खिलाते रहने से भी कीड़े पखाने के
साथ मरकर निकल जाते है।
3- पका हुआ टमाटर दो नग, कालानमक डालकर सुबह-सुबह 15
दिन लगातार खाने से बालकों के चुननू आदि कीड़े मरकर पखाने
के साथ निकल जाते है। सुबह खाली पेट ही टमाटर खिलायें,
खाने के एक घंटे बाद ही कुछ खाने को दें।
4- बायबिरंग का पिसा हुआ चूर्ण तथा त्रिफला चूर्ण समभाग
को 5ग्राम की मात्रा में चीनी या गुड़ के साथ सुबह खाली पेट
एवं रात्रि में खाने के आधा घंटे बाद सादे पानी से लगातार
10दिन दें। सभी तरह के कृमियों के लिए लाभदायक है।
5- नीबू के पत्तों का रस 2ग्राम में 5 या 6 नीम के पत्ते पीसकर
शहद के साथ 9 दिन खाने से पेट के कीड़े मर जाते हैं।
6- पीपरा मूल और हींग को मीठे बकरी के दूध के साथ 2ग्राम
की मात्रा में 6दिन खाने से पेट के कीड़े मर जाते हैं।
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पाण्डु रोग (पीलिया)
चरक ऋषि ने लिखा है कि
पाण्डुरोगाः स्मृताः पंच वातवित्तकफास्त्रयः।
चतुर्थः सन्निपातेन पंचमो भक्षणात्मूदः।।
(1) वात का (2) पित्त का (3) कफ का (4) सन्निपात का और
(5) मिट्टी का - इस प्रकार पाण्डु (पीलिया) रोग पांच प्रकार
का होता है।
(1) वातज पाण्डु (पीलिया) के लक्षण
चरक ने लिखा है, बादी करने वाले अन्नपानादि सेवन करने
और उपवास आदि करने से वायु कुपित होकर कष्टसाध्य पाण्डु
रोग पैदा करती है। इसमें शरीर का रंग रूखा और काला रंग मिला
सा हो जाता है। शरीर में दर्द होता है, सुई चुभने की सी पीड़ा
होती है, कपकपी आती है, पसलियों और सिर में दर्द होता है,
मल सूख जाता है और मुख में विरसता होती है। सूजन, कमजोरी
और अफारा होता है। सुश्रुत ऋषि कहते हैं कि वायु के पाण्डु रोग
में नेत्रों में पीलापन लिये ललाई होती है।
(2) पित्त पाण्डु (पीलिया) के लक्षण
चरक ने लिखा है, पित्तकारक आहार-विहार से पित्त कुपित
होकर रक्तादि धातुओं को दूषित करके पाण्डु रोग पैदा होता
है। पित्त प्रधान पाण्डु रोग में रोगी का रंग हरा या पीला
होता है, ज्वर ,दाह, वमन, मूर्छा और प्यास होती है तथा मल-मूत्र
पीले होते हैं। रोगी का मुंह कड़वा रहता है, वह कुछ भी खाना
नहीं चाहता तथा गर्म और खट्टे पदार्थ सहन नहीं कर सकता। उसे
खट्टी डकारें आती है। अन्न विदग्ध होने से शरीर में विद्रोह
होता है। बदन से बदबू निकलती है, मल पतला उतरता है, शरीर
कमजोर हो जाता है और सामने अंधेरा मालूम होता है। रोगी
शीतल पदार्थों या ठण्ड को पसन्द करता है।
(3) कफज पाण्डु (पीलिया) के लक्षण
चरक ने लिखा है, कफकारी पदार्थांे से कफ कुपित होकर
रक्तादि धातुओं को बिगाड़कर कफ का पाण्डु रोग पैदा होता
है। इसमें भारीपन, तन्द्रा, वमन, सफेद रंग होना, लार गिरना, रोंए
खड़े होना, थकान मालूम होना, बेहोशी, भ्रम, श्वास, आलस्य,
अरुचि, आवाज रुकना, गला बैठना, मूत्र, नेत्र और विष्ठा का
सफेद होना, रूखे, कड़वे और खट्टे पदार्थांे का अच्छा लगना, सूजन
और मुँह का जायका नमकीन सा रहना-ये लक्षण होते हैं।
(4) सन्निपातज पाण्डु (पीलिया) के लक्षण
यह सब तरह के अन्नों के सेवन करने वाले मनुष्य के दूषित हुये
तीनों दोषों से उपर्युक्त तीनों दोषों के लक्षणों वाला,
अत्यन्त असह्य घोर पाण्डु रोग होता है। सन्निपात के पाण्डु
रोग वाले को तन्द्रा, आलस्य, सूजन, वमन, खांसी, पतले दस्त,
ज्वर, मोह, प्यास, ग्लानि और इन्द्रियों की शक्ति का नाश,
जैसे लक्षण होते है।
(5) मिट्टी खाने से हुये पाण्डु के लक्षण
जिस मनुष्य का मिट्टी खाने का स्वभाव पड़ जाता है,
उसके वात, पित्त और कफ कुपित हो जाते है। कसैली मिट्टी से
वायु कुपित होती है, खारी मिट्टी से पित्त कुपित होता है
और मीठी मिट्टी से कफ कुपित होता है। खारी मिट्टी पेट में
जाकर रसादिक धातुओं को रूखा कर देती है। जब रूखापन पैदा
हो जाता है, तब जो अन्न खाया जाता है, वह भी रूखा हो
जाता है। फिर वही मिट्टी पेट में पहुँचकर बिना पके रस को रस
बहाने वाली नसों में ले जाकर नसों की राह बन्द कर देती है। जब
रक्त बहाने वाली नसों की राहें रुक जाती हैं, शरीर की
कान्ति, तेज और ओज क्षीण हो जाते है, तब पाण्डु रोग पैदा
होता है। पाण्डु रोग होने से बल, वर्ण और अग्नि का नाश होता
है।
ऐलोपैथी के मतानुसार: -
ऐलोपैथी में पीलिया या कामला को जॉण्डिस
( रंनदकपबम ) कहते हैं। इसमें आंखों के श्वेत पटल, त्वचा तथा
श्लेष्माला कला का रंग पीला हो जाता है। यह पीलापन रक्त
में पाये जाने वाले एक रंजक पदार्थ ‘बिलिरुबिन‘ (पित्त-अरुण)
की अधिकता से होता है। लाल रक्त कण बनने की क्रिया में ही
कोई गड़बड़ी हो जाती है तथा यकृत सही ढंग से काम नहीं
करता।
लक्षण
पहले आंखों का श्वेत होना फिर चेहरा, गर्दन, हाथ-पैर, और
पूरे शरीर में पीलापन हो जाना, तालू भी पीला हो जाता है,
लम्बी अवधि तक रहने वाले पीलिया में त्वचा का रंग गहरे हरे रंग
का हो जाता है। मल अधिक मात्रा में होता है। पसीना भी
पीला रंग का होता है। नाड़ी धीमी चलती है तथा आसपास
की सभी चीजें पीली दिखाई देती हैं।
पाण्डु रोग के पहले के लक्षण
जब पाण्डु होने वाला होता है, तब चमड़ी का फटना,
बारम्बार थूकना, अंगों का जकड़ना, मिट्टी खाने पर मन चलना,
आंखों पर सूजन आना, मल और मूत्र का पीला होना तथा अन्न
का न पचना-ये लक्षण पहले ही नजर आते हैं।
पीलिया रोग निवारण अनुभूत नुस्खे
(1)  फूल फिटकरी का चूर्ण 20ग्राम लेकर उसकी 21पुड़िया बना
लें। एक पुड़िया की आधी दवा को सुबह मलाई निकले 100 ग्राम
दही में चीनी मिलाकर खाली पेट सुबह खा लें। इसी प्रकार
रात्रि में सोते समय बकाया आधी पुड़िया खा लें। इस प्रकार
21दिन लगातार दवा खाने से पीलिया रोग सही हो जाता हैं।
नोट - 50ग्राम सफेद फिटकरी गर्म तवा में डालकर भून लें। जब
उसके अन्दर का पानी सूख जाये, तो उसे पीसकर रख लें, वह ही
फूल फिटकरी है। जब तक मरीज यह दवा खाता है, तब तक अगर
गन्ने का रस मिल सके, तो जरूर पियें। यह योग पूर्णतः परीक्षित
है।
(2) कुटक 1तोला, मुनक्का 1तोला, त्रिफला आधा तोला को
रात को पानी में भिगोएं। सुबह पीसकर दिन में दो बार चीनी
मिलाकर 21दिन लगातार लेते रहने से पीलिया में आराम
मिलता है।
(3) मूली के पत्तों के 100ग्राम रस में 20ग्राम चीनी मिलाकर
पिलायें। साथ ही मूली, सन्तरा, पपीता, तरबूज, अंगूर, टमाटर
खाने को दें। साथ ही गन्ने का रस पिलायेें और पेट साफ रखें।
पीलिया में आराम जरूर मिलेगा।
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हृदय रोगः कारण एवं निवारण
हृदय, अर्थात् दिल शरीर का सबसे मूल्यवान् अंग है। इसकी
धड़कन की स्थिति देखकर ही हम किसी के रोगी या निरोगी
होने की पुष्टि करते हैं। यह हृदय ही सारे शरीर में शुद्ध ऑक्सीजन्
युक्त रक्त को पहुँचाने की जिम्मेदारी निर्वहन करता है। इसके
लिये उसे पर्याप्त ऊर्जा की आवश्यकता होती है। जब यह शक्ति
कम हो जाती है या उसकी आपूर्ति में गतिरोध आने लगता है,
तो अनेकों परेशानियाँ खड़ी होने लगती हैं।
हृदय असंख्य पतली - पतली नसों एवं मांसपेशियों से युक्त एक
गोल लम्बवत् खोखला मांस पिण्ड होता है। इसके अन्दर चार
खण्ड (पार्ट) होते हैं और प्रत्येक खण्ड में एक ऑटोमैटिक वाल्व
लगा रहता है। इससे पीछे से आया हुआ रक्त उस खण्ड में इकट्ठा
होकर आगे तो जाता है, परन्तु वापस आने से पहले वाल्व बन्द हो
जाता है, जिससे वह रक्त शरीर के सभी भागों में चला जाता है।
ऐसा हृदय के चारांे भागों में चलता रहता है। जब इन ऑटोमैटिक
वाल्वों में खराबी आ जाती है, तो रक्त पूरी मात्रा में आगे नहीं
जा पाता और कुछ वापस आ जाता है, इससे रक्त सारे शरीर को
पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाता है और कई तरह की
परेशानियाँ खड़ी होती हैं। हृदय पर अतिरिक्त बोझ पड़ने लगता
है। जिससे उसमें अचानक तीव्र दर्द उठता है, जो असहनीय होता
है। यह दर्द सीने के बीच के हिस्से में होता हुआ बायीं बाजू, गले व
जबड़े की तरफ जाता है।
कारण
ज्यादा चर्बीयुक्त आहार प्रतिदिन लेने से वह चर्बी नसों में
इकट्ठी होती जाती है और धमनियों में सिकुड़न या छेद हो
जाता है इससे रक्त संचार धीमा हो जाता है, जिससे हृदय में
अतिरिक्त दबाव बढ़ जाता है और शरीर में रक्त प्रवाह की कमी
हो जाती है। इस स्थिति में जब हम तेज - तेज चलते हैं, सीढ़ियाँ
चढ़ते है या कोई वजन उठाते है, तब हमें ज्यादा ऊर्जा की जरूरत
पड़ती हैै।
हृदय रोग से सम्बन्धित बीमारियाँ
1-उच्च रक्तचाप -
उच्च रक्तचाप के लगातार बने रहने से हृदय में अतिरिक्त दबाव
बना रहता हैै, जिससे हृदय रोग होने की सम्भावना ज्यादा
रहती है। अगर समय रहते दवाओं के माध्यम से ब्लड प्रेशर को
सामान्य कर लिया जाये, तो हृदय रोग होने की सम्भावना घट
जाती है।
2- गुर्दे की बीमारियाँ
गुर्दे की कई प्रकार की बीमारियों की वजह से खून की
सफाई का कार्य बाधित होता है और हृदय में दूषित खून के बार -
बार जाने से उसकी मांसपेशियाँ कमजोर पड़ने लगती है, जो हृदय
रोग का कारण बनती हैैं।
3- डायबिटीज अर्थात् मधुमेह
जब डायबिटीज के कारण खून में शुगर की मात्रा बढ़ जाती
है और लम्बे समय तक बराबर बनी रहती है, तो धीरे - धीरे यही हृदय
रोग का कारण बनती है।
4- मोटापे की अधिकता
जब अनियमित खान-पान से या कई प्रकार की हारमोनल
बीमारियों से व्यक्ति का मोटापा बढ़ जाता है तब भी हृदय
रोग सामान्य से ज्यादा होने की सम्भावना रहती है।
5- पेट में कीडे़ (कृमि) होने पर
जब आमाशय में दूषित खान - पान की वजह से कृमि पड़ जाते
हैं और समय से इलाज न मिलने की वजह से पर्याप्त बड़े हो जाते है,
तब वे वहां रहते हुए आपका खाना भी खाते हैं तथा दूषित मल भी
विसर्जित करते हैं और वही खून हृदय में बार-बार जाता है जो
हृदय रोग का कारण बनता है इसलिये वर्ष में एक बार कीड़े मारने
की दवा अवश्य खानी चाहिये ।
6- खान-पान
तनावमुक्त रहते हुए, शाकाहारी भोजन को पूर्णतः अपने
जीवन में अपनाकर काफी हद तक हृदय रोग से बचा जा सकता है।
इस सम्बन्ध में निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखें।
1- शरीर की आवश्यकता के अनुसार ही कम चिकनाईयुक्त
आहार लेना चाहिए। 40वर्ष की उम्र
के बाद आवश्यकता से अधिक खाना स्वास्थ्य की दृष्टि से
हानिकारक है। नसों में अत्यधिक चर्बी के जमाव को रोकने के
लिए चोकरयुक्त आटे की रोटियाँ, ज्यादा मात्रा में हरी
सब्जियाँ, सलाद, चना, फल आदि का उपयोग करंे।
2- खाने में लाल मिर्च, तीखे मसाला आदि एक निर्धारित
मात्रा में ही सब्जी में डालें तथा ज्यादा तली चीजें, तेल युक्त
अचार आदि बहुत कम मात्रा में लें। एक बार में ज्यादा खाना न
खाकर आवश्यकतानुसार थोड़ा-थोड़ा कई बार खाना खायें।
3- सूर्योदय के पहले उठना, धीरे - धीरे टहलना, स्नान आदि करके
हल्के योग एवं ध्यान आदि प्रतिदिन करना चाहिये।
4- मांसाहार, अण्डे, शराब व धूम्रपान, तम्बाकू आदि से पूर्णतः
अपने आपको बचायें। ये हृदय एवं शरीर के लिये अत्यन्त घातक हैं
इसलिये इनका भूल कर भी सेवन न करें।
5- मानसिक तनाव को दूर रखें। इससे हृदय में दबाव पड़ता है। सदा
ही प्रसन्न रहने की कोशिश करें, क्रोध बिल्कुल न करें, सदा हंसते
रहें।
हृदय रोग के लक्षण
ज्यादा तेज चलने, सीढ़ियाँ चढ़ने या साइकिल आदि चलाने
से सांस फूलना, कमजोरी व थकान लगना, पसीना अधिक
आना, सीने में दर्द होना, मिचली आना, पैरों में सूजन हो
जाना, दिल की धड़कन बढ़ना, घबराहट होना, रात में नींद कम
आना व अचानक खुलने पर नींद न आना आदि होने से समझ लें कि
आपको हृदय रोग पकड़ रहा है। इसलिये समय रहते तुरन्त चिकित्सक
से सम्पर्क करंे। ऐलोपैथी में अनेकों दवायें खून पतला करने की एवं
हृदय को ताकत देने की हैं और जब यह दवायें काम नहीं करती हैं
तो आपरेशन ही अन्तिम विकल्प बचता है।
हृदय रोग निवारक आयुर्वेदिक औषधियाँ -
जैसे ही हमें चिकित्सकों से यह पता चले की हम हृदय रोग की
चपेट में आ चुके हैं तो किसी योग्य आयुर्वेदिक डाक्टर या वैद्य
द्वारा निर्देशित दवाओं का सेवन चालू कर दें। आज भी आयुर्वेद
में इतनी क्षमता है कि वह हृदय रोग को ठीक कर सकता है।
आयुर्वेद रोग को दबाता नहीं, अपितु उसे समूल नष्ट करता है।
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हाई ब्लड प्रेशर ( उच्च रक्तचाप )
मानव शरीर का प्रमुख अंग हृदय है, जो उसके विभिन्न अंगों में
धमनियों के माध्यम से रक्त की आपूर्ति करता है ये धमनियाँ पेड़
की टहनियों की तरह हैं, जो समस्त शरीर से होते हुए आखिर में
फेफड़े में पहुँचती हैं। वहाँ सांस के द्वारा कार्बन डाई आक्साईड
निकलकर शुद्ध सांस द्वारा आक्सीजन शोषित होती है और
समस्त शरीर में फैला कर शरीर का पोषण करती है। हृदय एक
निश्चत दबाव में ही रक्त को समस्त शरीर में भेजता है इसकी एक
मिनट में औसतन गति 72बार धड़कने की होती है जो एक स्वस्थ्य
व्यक्ति में होती है और यही गति जब बढ़ने लगती है तो उसे हाई
ब्लड प्रेशर के रूप में देखा जाता है।
हाई ब्लड प्रेसर को बढ़ाने वाले कारण
जन्म के समय मनुष्य का रक्तचाप सबसे कम रहता है। जैसे -जैसे
उम्र बढ़ती जाती है, रक्तचाप भी बढ़ता है। व एक निश्चित
दबाव में ही रहता है। परन्तु, आज के प्रदूषण की वजह से शरीर में
शुद्ध वायु का अभाव हो जाता है। इससे रक्तचाप बढ़ने की
सम्भावना बढ़ जाती है। महिलाओं की अपेक्षा पुरुषांे में हाई
ब्लड प्रेशर ज्यादा होने की सम्भावना रहती है। यह रक्तचाप
कुछ परिवारों में आनुवंशिक भी होता है। शराब पीने, धूम्रपान से
तथा नमक अधिक सेवन से रक्तचाप अधिक होता है। कुछ दवायें
भी ब्लड प्रेसर हाई करती है। सबसे ज्यादा प्रभावक आज का
खान-पान है जो, शरीर को पौष्टिकता कम और रासायनिक
तत्त्व ज्यादा देता है। इससे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता घटने
लगती है और यह हाई ब्लड प्रेसर का कारण बनता है।
ब्लड प्रेसर से होने वाली हानियाँ -
शरीर के हर भाग में पतली-पतली नस-नाड़ियाँ रहती हैं। जब
ब्लड प्रेशर हाई होता है, तो इन पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
जो नाड़ी इस दबाव को बर्दाश्त नहीं कर पाती हैं, वे फट
जाती हैं और खून बहना चालू हो जाता है। जिस प्रकार नाक के
अन्दर की नाड़ी फटने से रक्त बहने लगता है जिसे आम बोल चाल
मे नकसीर फूटना कहते है। इसी प्रकार जब कोई कमजोर नाड़ी
फेफड़े के अन्दर फूटती है तो कफ से खून आने लगता है। इसी तरह
मष्तिस्क की नसें भी फटती हैैं। रक्तचाप के अधिक समय तक बढ़े
रहने से महीन नसों की अन्दर की दीवारों में चर्बी के जमाब से वे
कड़ी एवं संकरी हो जाती है। इससे शरीर के विभिन्न अंगों मंे खून
की पूर्ति नहीं हो पाती है और उस अंग का रोग बन जाता है।
यही बढ़ा ब्लड प्रेसर जब गुर्दे पर दबाव ड़ालता है, तो गुर्दे का
कार्य प्रभावित होता है यहाँ तक कि गुर्दे फेल भी होने लगते हैं।
बढ़े हुये रक्तचाप से आँखों की रोशनी भी प्रभावित होती है।
यही दबाव लगातार जब हृदय पर पड़ता है, तो एन्जाइन हार्ट
अटैक की स्थिति बन जाती है। हाई ब्लड प्रेशर से व्यक्ति की
उम्र घटने लगती है, सोचने समझने की शक्ति भी क्षीण होने
लगती है।
हाई ब्लडप्रेसर से कैसे बचें -
1. नमक का उपयोग कम करना चाहिये क्योंकि वैज्ञानिक
प्रयोगों से पता चला है कि नमक अधिक खाने से रक्तचाप
बढ़ता है, अगर जिसको पता चल चुका है कि उसे ब्लड प्रेसर है तो
नमक की मात्रा खाने में कम कर देना चाहिये।
2. धूम्रपान एवं शराब आदि पीने से शरीर की स्थ्तिि
अनियंत्रित होती है और ब्लडप्रेसर हाई होता है। इसलिये भूल कर
भी ऐसी चीजों का सेवन न करंे। बीड़ी, सिगरेट, गांजा, अफीम,
चरस, हुक्का, आदि का धुआँ फेफड़े को बहुत ज्यादा नुकसान
पहुँचाता है और वही धुआँ आक्सीजन के साथ मिलकर रक्त में पहुंच
कर उसे भी दूषित करता है, वही रक्त समस्त अंगो में जाकर उनको
कमजोर करता है और इससे तरह-तरह की अनेकों बीमारियाँ पैदा
होने लगती है।
3. मानसिक उलझन से बचना चाहिये तथा ज्यादा मोटापा
भी ब्लडप्रेसर हाई करता है। अतः मोटापा ज्यादा न बढ़ने दें।
4. रक्तचाप के रोगियों को संतुलित भोजन करना चाहिये। हरी
सब्जी ज्यादा मात्रा में खानी चाहिये और सलाद भी भरपूर
मात्रा में लें तथा फास्ट फूड जैसी चीजे न खायें। घी तेल का
सेवन कम मात्रा में करे एवं शरीर की आवश्यकता से अधिक
भोजन न करंे।
5. हल्के योगासन, प्राणयाम एवं ध्यान प्रक्रिया नियमित
करना चाहिए। भारी योगासन न करंे परन्तु कम से कम 30मिनट
योगासन करने का समय अवश्य दें। इसके बाद सुखासन या जिस
आसन में आप परेशानी महसूस न करें, उसमें रीढ़ की हड्डी सीधी
कर बैठ जाये एवं धीरे-धीरे गहरी सांस अन्दर तक लें और धीरे-धीरे
बाहर निकालें। इस प्रकार 15से 30बार प्रतिदिन करने का
अभ्यास करें तथा फिर शांत चित्त होकर बैठ जायें एवं अपना
ध्यान दोनों भौहों के मध्य आज्ञाचक्र में केन्द्रित करने की
कोशिश करंे और मन ही मन अपने शरीर में भाव रखें कि मेरा
ब्लडप्रेशर सामान्य हो रहा है। यह प्रक्रिया कम से कम 10से
20मिनट तक अवश्य करंे। आप देखेंगे की आपका ब्लड प्रेसर
सामान्य आने लगेगा। शरीर की कार्य करने की क्षमता बढ़ने
लगेगी।
6. उक्त रक्त चाप से कोलेस्ट्राल का अधिक संबंध नहीं है। परन्तु,
यह हृदय रोग से जुड़ा है, इसलिये उक्त रक्तचाप के मरीजांे को
भोजन में सेचुरेटेड फैट (घी, मलाई, मांस, युक्त चर्बी, अंडा) आदि
का सेवन भूल कर भी नहीं करना चाहिये। जो व्यक्ति
मांसाहार, अंडा आदि का सेवन करता है उसका ब्लड प्रेसर
निश्चय ही अनियंत्रित हो जाता है, जो शरीर के लिये
हानिकारक है। इसलिये जो व्यक्ति मंासाहार, अंडा आदि का
सेवन करता है उसका ब्लडप्रेशर निश्चय ही अनियंत्रित हो
जाता है। यह शरीर के लिये हानिकारक है इसलिये मंासाहार
का पूर्णतः त्याग कर देना चाहिये।
आयुर्वेद से रोग निवारण -
1. करेला (कड़वा वाला) का रस 50ग्राम को निकालकर
प्रतिदिन सुबह खाली पेट पीना चाहिये।इसके एक घण्टे बाद ही
कुछ खायें। इससे धीरे-धीरे ब्लडप्रेशर नार्मल होने लगता है।
2. गौमूत्र का अर्क अगर प्रतिदिन सुबह खाली पेट एवं रात्रि में
सोते समय 10-10 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन लिया जाये,
तो भी ब्लडप्रेशर नार्मल हो जाता है।
3. अर्जुन की छाल का चूर्ण 5ग्राम की मात्रा सुबह एवं 5ग्राम
की मात्रा शाम को सोते समय लगातार लेने से ब्लडप्रेशर
नार्मल होता है एवं हृदय से सम्बन्धित बीमारियों में पूर्ण लाभ
मिलता है, यहाँ तक कि डॉक्टर ने अगर हृदय का ऑपरेशन भी
बताया हो, तो उससे भी बचा जा सकता है।
4 वृहद् वातचिन्तामणि रस 3 रत्ती की मात्रा सुबह शहद से लेने
पर हाई ब्लडप्रेशर नार्मल हो जाता है।
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चर्मरोग
चर्मरोग एक कष्ट दायक रोग है, जो पूरे शरीर की चमड़ी में
कहीं भी हो सकता है। अनियमित खान-पान, दूषित आहार,
शरीर की समय-समय पर सफाई न होने एवं पेट में कृमि के पड़ जाने
और लम्बे समय तक पेट में रहने के कारण उनका मल नसों द्वारा
अवशोषित कर खून में मिलने से तरह तरह के चर्मरोग सहित
शारीरिक अन्य बीमारियां पनपने लगती हैं जो मानव या अन्य
जीवों के लिए अति हानिकारक होती है।
दाद (दद्रु) के लक्षण
इसमें खुजली इतनी होती है कि आप उसे खुजाते
ही रहें और खुजाने के बाद जलन होती है, छोटे-छोटे दाने होते हैं,
चमड़ी लाल रंग की मोटी चकत्तेदार हो जाती हैं। दाद
ज्यादातर जननांगांे में जोड़ोें के पास और जहाँ पसीना आता है
व कपड़ा रगड़ता है, वहां पर होती है। वैसे यह शरीर में कहीं भी हो
सकती है।
खाज (खुजली)
इसमें पूरे शरीर में सफेद रंग के छोटे-छोटे दाने हो
जाते हैं। इन्हें फोड़ने पर पानी जैसा तरल निकलता है जो पकने पर
गाढ़ा हो जाता है। इसमें खुजली बहुत होती है, यह बहुधा हांथो
की उंगलियों के जोड़ों में तथा पूरे शरीर में कहीं भी हो सकती
है। इसको खुजाने को बार-बार इच्छा होती है और जब खुजा देते
है, तो बाद में असह्य जलन होती है तथा रोगी को 24 घंटे चैन
नहीं मिलता है। इसे छुतहा, संक्रामक, एक से दूसरे में जल्दी ही
लगने वाला रोग भी कहते है। रोगी का तौलिया व चादर
उपयोग करने पर यह रोग आगे चला जाता है, अगर रोगी के हाथ में
रोग हो और उससे हांथ मिलायें तो भी यह रोग सामने वाले को
हो जाता है।
उकवत (एक्जिमा) -
दाद, खाज, खुजली जाति का एक रोग उकवत
भी है, जो ज्यादा कष्टकारी है। रोग का स्थान लाल हो
जाता है और उस पर छोटे-छोटे दाने हो जाते हैं। इसमंे चकत्ते तो
नही पड़ते परन्तु यह शरीर में कहीं भी हो जाता है। यह ज्यादातर
सर्दियों में होता है और गर्मियों में अधिकांशतया सही हो
जाता है। अपवाद स्वरूप गर्मी में भी हो सकता है। यह दो तरह
का होता है। एक सूखा और दूसरा गीला। सूखे से पपड़ी जैसी
भूसी निकलती रहती है और गीले से मवाद जैसा निकलता रहता
है। अगर यह सर में हो जाये तो उस जगह के बाल झड़ने लगते हैं। यह
शरीर में कहीं भी हो सकता है।
गजचर्म
कभी-कभी शरीर के किसी अंग की चमड़ी हाथी के पांव के
चमड़े की तरह मोटी, कठोर एवं रूखी हो जाती है। उसे गजचर्म
कहते हैं।
चर्मदख
शरीर के जिस भाग का रंग लाल हो, जिसमें बराबर दर्द रहे,
खुजली होती रहे और फोड़े फैलकर जिसका चमड़ा फट जाय तथा
किसी भी पदार्थ का स्पर्श न सह सके, उसे चर्मदख कहते हैं।
विचर्चिका तथा विपादिका
इस रोग में काली या धूसर रंग की छोटी-छोटी फुन्सियां
होती हैं, जिनमें से पर्याप्त मात्रा में मवाद बहता है और खुजली
भी होती है तथा शरीर में रूखापन की वजह से हाथांे की चमड़ी
फट जाती है, तो उसे विचर्चिका कहते हैं। अगर पैरों की चमड़ी
फट जाय और तीव्र दर्द हो, तो उसे विपादिता कहते हैं। इन
दोनांे में मात्र इतना ही भेद है।
पामा और कच्छु
यह भी अन्य चर्म रोगों की तरह एक प्रकार की खुजली ही है।
इसमें भी छोटी-छोटी फुन्सियां होती हैं। उनमें से मवाद
निकलता है, जलन होती है और खुजली भी बराबर होती रहती
है। अगर यही फुन्सियां बड़ी-बड़ी और तीव्र दाहयुक्त हों तथा
विशेष कमर या कूल्हे में हांे, तो उसे कच्छू कहते है।
चर्मरोग चिकित्सा
(1) दाद, खाज, खुजली
(अ) आंवलासार गंधक को गौमूत्र के अर्क में मिलाकर प्रतिदिन
सुबह-शाम लगायें। इससे दाद पूरी तरह से ठीक हो जाता है।
(ब) शुद्ध किया हुआ आंवलासार गंधक 1 रत्ती को 10 ग्राम
गौमूत्र के अर्क के साथ 90 दिन लगातार पीने से समस्त
चर्मरोगों में लाभ होता है।
(2) एक्जिमा (चर्म रोगों में लगाने का महत्व) -
आंवलासार गंधक 50 ग्राम, राल 10 ग्राम, मोम
(शहद वाला) 10 ग्राम, सिन्दूर शुद्ध 10 ग्राम, लेकर पहले गंधक
को तिल के तेल में डालकर धीमी आंच पर गर्म करें। जब गन्धक तेल
में घुल जाय, तो उसमें सिन्दूर व अन्य दवायें पाउडर करके मिला दें
तथा सिन्दूर का कलर काला होने तक इन्हंे पकायें और आग से
नीचे उतारकर गरम-गरम ही उसी बर्तन में घोंटकर मल्हम (पेस्ट)
जैसा बना लें। यह मल्हम एग्जिमा, दाद, खाज, खुजली, अपरस
आदि समस्त चर्मरोगों में लाभकारी है। यह मल्हम सही होने तक
दोनों टाइम लगायें।
(3) दाद, खाज, खुजली, एग्जिमा, अकौता, अपरस का मरहम
गन्धक-10 ग्राम, पारा 3 ग्राम, मस्टर 3 ग्राम,
तूतिया 3 ग्राम, कबीला 15 ग्राम, रालकामा 15 ग्राम, इन सब
को कूट-पीसकर कपड़छन करके एक शीशी में रख लें। दाद में
मिट्टी के तेल (केरोसीन) में लेप बनाकर लगायंे, खाज में सरसों के
तेल के साथ मिलाकर सुबह-शाम लगायें। अकौता एग्जिमा में
नीम के तेल में मिलाकर लगायें। यह दवा 10 दिन में ही सभी
चर्मरोगो में पूरा आराम देती है।
(4)दाद, दिनाय -
चिलबिल (चिल्ला) पेड़ की पत्ती का रस केवल
एक बार लगाने से दाद दिनाय या चर्म रोग सही हो जाता है।
अगर जरूरत पड़े तो दो या तीन बार लगायें, अवश्य लाभ मिलेगा।
(5) चर्म रोग नाशक अर्क
शुद्ध आंवलासार गंधक, ब्रह्मदण्डी, पवार
(चकौड़ा) के बीज, स्वर्णछीरी की जड़, भृंगराज का पंचांग,
नीम के पत्ते, बाबची, पीपल की छाल, इन सभी को 100 -100
ग्राम की मात्रा में लेकर जौ कुट कर शाम को 3 लीटर पानी में
भिगो दें। साथ ही 10 ग्राम छोटी इलायची भी कूटकर डाल दें
और सुबह इन सभी का अर्क निकाल लें। यह अर्क 10 ग्राम की
मात्रा में सुबह खाली पेट मिश्री के साथ पीने से समस्त चर्म
रोगों में लाभ करता है। इसमें खून में आई खराबी पूरी तरह से
मिटती है और खून शुद्ध हो जाता है। इसके सेवन से मुँह की झांई,
आंखांे के नीचे कालापन, मुहासे, फुन्सियां, दाद, खाज, खुजली,
अपरस, अकौता, कुष्ठ आदि समस्त चर्मरोगों में पूर्ण लाभदायक
है।
रक्त शोधक
(अ) रीठे के छिलके के पाउडर में शहद मिलाकर
चने के बराबर गोलियाँ बना लें। प्रातःकाल एक गोली
अधबिलोये दही के साथ और सायंकाल पानी के साथ निगलंे ।
उपदंश, खाज, खुजली, पित्त, दाद और चम्बल के लिए पूर्ण
लाभप्रद है।
(ब) सिरस की छाल का पाउडर 6 ग्राम सुबह व
शाम शहद के साथ 60 दिन सेवन करें। इससे सम्पूर्ण रक्तदोष सही
होते हैं।
(स) अनन्तमूल, मूलेठी, सफेद मूसली गोरखमुण्डी,
रक्तचन्दन, शनाय और असगन्ध 100 -100 ग्राम तथा सौंफ, पीपल,
इलायची, गुलाब के फूल 50 -50 ग्राम। सभी को जौकुट करके एक
डिब्बे में भरकर रख लें और एक चम्मच (10ग्राम) 200 ग्राम पानी
में धीमी आंच में पकाएं और जब पानी 50 ग्राम रह जाय तब उसे
छानकर उसके दो भाग करके सुबह और शाम मिश्री मिलाकर
पियंे। यह क्वाथ रक्त विकार, उपदंश, सूजाख के उपद्रव,
वातरक्त और कुष्ठरोग को दूर करता है।
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श्वेत कुष्ठ (सफेद दाग)
जिस भी किसी व्यक्ति को सफेद दाग हो
जाते हैं, उसे समाज हेय दृष्टि से देखता है। यहां तक कि जिस बच्चे
या बच्ची के सफेद दाग होता है उसकी शादी तक रुक जाती है,
जिससे मानसिक क्लेस होता है और समाज यह कहता है कि यह
अपने बुरे कर्मो का फल भोग रहा है। कुछ हद तक यह बात सही भी
है। परन्तु अगर रोग के विषय में सोचा जाये तो कोई भी रोग हो
वह पीड़ादायक होता है और यहंा तक मेरा मानना है कि कोई
भी मनुष्य इन रोगों से नही बचा है, प्रत्येक मनुष्य को कोई न
कोई रोग है ही। इससे यही सिद्ध होता है कि प्रत्येक मनुष्य
अपने-अपने बुरे कर्मो के फलस्वरूप अलग-अलग रोगों के कष्ठोें को
झेलता है। परन्तु, प्रकृतिसत्ता माता आदिशक्ति जगत जननी
जगदम्बा जी ने इन रोगों से उबरने के रास्ते भी आयुर्वेद एवं अन्य
अनेक विधाओं के माध्यम से बताये है, जिन्हें अपना कर हम इन
कष्टदायक रोगों से मुक्ति पा सकते है। यहां हम सफेद दाग सही
करने वाले अपने अनुभवगम्य नुस्खे लिख रहें हैं पाठक गण इनका
लाभ अवश्य उठायें ।
सफेद दाग क्या है ?
सफेद दाग भी एक तरह का कुष्ठ ही है, इसमें कुष्ठ
की तरह चमड़ा बिगड़ जाता है। इसमें चमड़ी सफेद पड़ जाती है।
यह दो तरह का होता है- पहला सफेद एवं दूसरा लाल। परन्तु,
दोनों पीड़ा दायक ही हैं। गलित कुष्ठ और सफेद कुष्ठ में अन्तर यह
है कि गलित कुष्ठ (कोढ़) टपकता है अर्थात् अंगों में गलन चालू
हो जाती है, अंग गल-गल कर गिरने लगते हैं और सफेद दाग में चमड़ी
सफेद या लाल कलर की हो जाती है। कोढ़ वात पित्त और कफ
तीनों दोषों के प्रकोप से होता है, परन्तु सफेद दाग केवल एक
दोष से होता है। कोढ़ रसादि समस्त धातुओं में रहता है पर सफेद
दाग रुधिर, मांस और मेद में रहता है, बस यही गलित कोढ़ और सफेद
कोढ़ (सफेद दाग) में अन्तर है। चरक, भाव प्रकाश आदि ग्रन्थों में
अलग-अलग तरह से एक ही बात कही है कि वात जनित सफेद दाग
से पित्त जनित एवं पित्त जनित सफेद दाग से कफ जनित सफेद
दाग भारी होता है। जो सफेद दाग काले रोमों वाला, पतला,
रुधिर युक्त और तत्काल का नया हो तथा आग से जलकर न हुआ
हो, वह साध्य होता है। इसके सिवा सफेद दाग असाध्य होता है।
खुजली, कोढ़, उपदंश, आतशक, भूतोन्माद, व्रण,
ज्वर, हैजा, यक्ष्मा (टी.वी.) आंख दुखना, चेचक, जुकाम आदि
छुतहे रोगों की श्रेणी में आते हैं। अतः ऐसे रोगियों के कपड़े,
बिस्तर, खाने के बर्तन, मुख की सांस आदि से बचना चाहिए,
नहीं तो रोग फैलने का खतरा रहता है और ऐसे रोगियों की
चिकित्सा जल्दी ही करनी चाहिये जिससे यह रोग आगे न फैल
सके।
सफेद दाग निवारक नुस्खे
1- पैर में मसलने की दवा
कड़वा ग्वारपाठा (कड़वी घृतकुमारी) के गूदा
को पीतल या कांसे या स्टील की थाली में डालकर उसमें
रोगी के दोनों पैर गूदे में तब तक घिसे हैं, जब तक कि रोगी के मुंह
में कड़वापन आ जाये। शुरू में 30 मिनट में मुंह कड़वा हो जाता है
और बाद में कम समय में ही मुंह में कड़वापन आ जाता है। यह
क्रिया प्रतिदिन दोनों समय लगातार कम से कम 90 दिन तक
या अधिक दाग सही होने तक करनी है। इस क्रिया से खून की
सफाई होती है और जो भी खाने व दागों मे लगाने की दवा दी
जाती है वह जल्दी असर करती है। इसलिए सफेद दाग के रोगी
को यह दवा का उपयोग जरूर करना चाहिये।
2- सफेद दागों पर लगानें की दवा -
(अ) 100 ग्राम एल की जड़ की छाल, 100 ग्राम
तेन्दू की जड़ की छाल, 30 ग्राम सफेद अकौवा (श्वेतार्क) के
पत्ते की भस्म, 30 ग्राम देशी खैर को कूट-पीसकर महीन बारीक
करें और 30 ग्राम बाबची के तेल में मिलाकर रख लें। सफेद दागों
पर इसका गौमूत्र के साथ मिलाकर सुबह शाम लेप करें। यह लेप
लगातार दाग सही होने तक धैर्य के साथ करें। इससे दाग निश्चय
ही सही होते हैं, समय जरूर लगता है।
(ब) गुलाब के ताजे फूल 50 ग्राम, अनार के ताजे
फूल 50 ग्राम तथा सफेद आक के पत्ते 10 नग, इन सबको गौमूत्र के
साथ पीसकर इसमें बाबची का तेल 30 ग्राम मिलाकर रख लें। इस
लेप को सफेद दागों पर प्रतिदिन दोनों समय लगायें, इससे भी
सफेद दाग चमड़ी के रंग के हो जाते हैं। यह दवा धैर्य के साथ दाग
सही होने तक लगायें।
(स) मालकागनी को 21 दिन तक गौमूत्र में
डुबाकर रखने के बाद उसका तेल निकाल लें। उसको प्रतिदिन
दोनों समय सफेद दागों पर दाग सही होने तक लगायें, इससे भी
सफेद दाग सही होते है।
3- सफेद दागों पर खाने की दवा -
(क) त्रिफला 50 ग्राम, बायबिरंग 50 ग्राम,
स्वर्णक्षीरी की जड़ 20 ग्राम, मेंहदी के फूल या छाल 20 ग्राम,
चित्रक 10 ग्राम, असन के फूल 50 ग्राम, अमरबेल 50 ग्राम, शुद्ध
बाबची 50 ग्राम, इन सबको कूट-पीसकर बारीक चूर्ण बना लें
और एक डिब्बे में रख लें। 3 ग्राम दवा को गौमूत्र अर्क 10 ग्राम
के साथ रात को सोते समय प्रतिदिन कम से कम 180 दिन या
रोग सही होने तक का सेवन करें।
नोट- बाबची को शुद्ध करने के लिये उसके बीजों को गौमूत्र में
सुबह भिगो दें। 24 घंटे बाद गौमूत्र बदल दें। गौमूत्र बदलने की यह
क्रिया 6 दिन लगातार करें। फिर बाबची को गौमूत्र से
निकाल कर धूप में सुखा लें। इससे बाबची पूर्णतः शुद्ध हो जाती
है। इसे ही दवा बनाने के उपयोग में लें।
(ख) कालीमिर्च, सौंफ, असगंध, सतावर, सेमरमूसर
ब्रह्मदण्डी, इन सभी को कूट-पीसकर इन सबके बराबर मिश्री
मिलाकर डिब्बे में रख लें। तीन ग्राम दवा खाली पेट सुबह गाय
के घी के साथ खायें और उसके 1 घंटे बाद तक कुछ न खायें। यह दवा
रोग सही होने के एक महीने बाद तक खानी है। इससे खून शुद्ध
होता है और सफेद दाग वाली चमड़ी अपने ओरिजनल कलर में
धीरे-धीरे आ जाती है।
(ग) असली मलयागिरी चन्दन बुरादा 50 ग्राम,
चाँदी की भस्म 12 ग्राम, सफेद मूसली 100 ग्राम, कंुजा मिश्री
100 ग्राम, छोटी इलायची 100 दाना, इन सभी को कुट-
पीसकर एक डिब्बे में रख लें। 10 ग्राम दवा को 5 ग्राम गौमूत्र
अर्क के साथ सुबह नास्ता के पहले एवं शाम को खाना खाने के
बाद 120 दिन तक लगातार लें। साथ ही इस दवा के खाने के एक
घंटे बाद खदिरारिष्ट तथा कुमारीआशव की चार-चार ढक्कन
दोनों दवाओं को मिलाकर पीयें। इससे भी सफेद दाग सही हो
जाते है।
परहेज - दवा सेवन समय तक प्रत्येक तरह का नमक पूर्णतः बन्द कर
दें। इस रोग मेें नमक का परहेज आवश्यक है अगर हम दवा सेवन समय में
नमक का सेवन करंेगे तो दवा का पूर्ण लाभ नहीं मिल पायेगा।
साथ ही खटाई, तली चीजें, लाल मिर्च आदि का सेवन और
मांसाहार एवं शराब पूर्णतः वर्जित र्है।
------------------------------------------------------
कैंसर
कैंसर रोग का नाम सुनते ही शरीर में एक सिहरन सी हो
जाती है। प्रत्येक आदमी के अन्दर भय व्याप्त हो जाता है
क्योंकि यह प्राणघातक रोग है। इसे लाइलाज माना जाता है।
प्रथम और द्वितीय स्तर तक पहुँचे कैंसर का इलाज तो संभव हो
सका है, परंतु तृतीय स्तर तक पहुँचे रोग का इलाज संभव नही है।
अगर कुछ प्रतिशत संभव भी है, तो इलाज इतना मंहगा है कि आम
आदमी के बस में नहीं है। फिर भी चिकित्सा जगत् अपनी
कोशिश बराबर कर रहा है। निरंतर नई-नई शोधंे कर रहा है। नई-नई
विधियांे से कैंसर निर्मूलन की कोशिश कर रहा है। कुछ हद तक
सफल भी हुआ है, परन्तु पूर्ण सफलता से अभी दूर है। इसका कारण
है कि प्रथम स्तर में कोई कैंसर को समझ नहीं पाता, जिसकी
वजह से वह उसका उचित इलाज नहीं लें पाता। अगर जिसने इस
रोग का परीक्षण भी करा लिया तो दवायें इतनी महंगी है कि
वह उनका सेवन नहीं कर पाता। इसलिए यह रोग बढ़ता ही जाता
है और अंततोगत्वा रोगी को निगल जाता है।
कैंसर रोग के कारण-
1- कैसर रोग के विषय की सम्पूर्ण जानकारी का अभाव ।
2- अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही की वजह से शरीर के
अन्दर एवं बाहर की साफ-सफाई न रखना ।
3- तम्बाकू और पान मसाला (गुटका) आदि का लगातार सेवन।
4- बीड़ी, सिगरेट, गांजा आदि का सेवन ।
5- शराब के लगातार सेवन से ।
6- पेट के कीडे़ (कृमि) से अमाशय या बड़ी आँत का कैंसर ।
7- मांसाहार के लगातार सेवन से।
जब व्यक्ति बीड़ी, सिगरेट, गांजा आदि का
लगातार सेवन करता है तो फेफड़ों को शुद्ध ऑक्सीजन नहीं
मिल पाती है, जिसके कारण खून पूर्णतः फिल्टर नही हो
पाता। यही प्रकिया लगातार बनी रहने की वजह से रोग
प्रतिरोधक क्षमता घटने लगती है और कोई भी रोग खड़ा हो
जाता है। ऐसा ही लगातार शराब के पीने से होती है।
पानमसाला एवं गुटका में पड़े रसायनों से मुँह में रियेक्शन के
फलस्वरूप हुए घाव कैंसर का रूप ले लेते हैं। इसी तरह पेट के कीड़े भी
कैंसर का कारण बनते हैं, जब पेट में कीड़े पड़ जाते हैं और वह वहां
रहते हुए अपना आकार बढ़ा लेते हैं, साथ ही बहुत सारे हो जाते हैं,
ऐसी स्थिति में जब आप खाना खाते हैं तो वह कीड़े उस खाने
को भी खा जाते हैं एवं मल विर्सजन करते हैं, वही जहरीला मल
आंतो द्वारा खींचकर खून में मिला दिया जाता है, जिससे खून
में खराबी आ जाती है, साथ ही जब कीड़ों को कुछ खाने को
नहीं मिलता तो वह आँतों की दीवारों को काटते हैं और वहां
घाव उत्पन्न कर देते हैं। जैसे ही हमारे खाने के साथ कैंसर के
बैक्टीरिया पेट में जाते हैं और उस घाव के सम्पर्क में आते हैं तो वह
घाव कैंसर में परिवर्तित हो जाता हैं। इसी प्रकार मांसाहार से
भी कैंसर फैलता है। जब कोई पशु-पक्षी कैंसर रोग से पीड़ित
होता है, हम उसे मारकर उसका मांस खाते हैं तो इस मांस के साथ
कैंसर के जीवाणु हमारे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और कैंसर रोग
का कारण बनते हैं।
कैंसर रोग के प्रारम्भिक लक्षण
1- शरीर में कहीं भी घाव हो, जो भरता न हो।
2- शरीर के किसी भी अंग से रक्त या मवाद लगातार आना।
3- शरीर के किसी अंग या स्तन में गांठ का होना तथा धीरे-
धीरे बढ़ना एवं उसे दबाने से दर्द होना।
4- लगातार अपच की शिकायत रहना।
5- खाना निगलनेे में कठिनाई होना।
6- लगातार मिचली की शिकायत होना।
7- पेट में लगातार दर्द बना रहना।
8- नाक में सूजन आना, सांस लेने में तकलीफ तथा लगातार नाक
में दर्द।
अगर ऐसी परिस्थिति आपके साथ हो रही है, तो इसे
सामान्य न मानकर किसी योग्य कैंसर विशेषज्ञ से जांच अवश्य
करा लें। अगर कैंसर की स्थ्तिि निकले तो तुरन्त डॉक्टर की
सलाह पर दवा का सेवन करंे। कैंसर, प्रथम और द्वितीय स्टेज तक
पूर्णतः सही किया जा सकता है। कैंसर रोग विशेषज्ञ आपका
कुछ रक्त परीक्षण, एक्सरे, अल्ट्रासाउण्ड या सी.टी. स्कैन व
एम.आर.आई. जैसी जांचें करेंगे, तथा इसकी पूर्ण स्थिति समझने के
लिए बायोप्सी परीक्षण कर आपको कैंसर की सही स्थिति
बता देंगे। उसी अनुसार आपकी रेडियोथिरेपी या कीमोथिरेपी
चिकित्सा की सलाह देंगे। यह चिकित्सा बहुत मंहगी है जिसे
सभी नहीं अपना सकते है।
कैसर के प्रथम और द्वितीय स्टेज के रोगी आयुर्वेद चिकित्सा
से भी पूर्णतः सही होते है। जरूरत है, लगन और विश्वास से इन
औषधियों के सेवन की, इसमें पैसा भी कम खर्च होता है और
साइड इफेक्ट भी नहीं होते हैं। जरूरत है सही दवाओं के मिलने की
और अच्छे वैद्य की देख रेख में दवा सेवन की।
कैंसर रोग निवारक आयुर्वेदिक औषधियाँ-
1- कैंसर नासक चूर्ण-
पारसपीपर के बीज की गिरी, शुद्ध कपूर,
जावित्री, जीयापोता (पुत्रजीवा) की गिरी, नीमगिलोय
का सत्व (स्वयं का बनाया हुआ), इन सभी औषधियों के समभाग
चूर्ण को एक साथ मिलाकर एक बन्द डिब्बे में रख लें। प्रतिदिन
सुबह खाली पेट आधा ग्राम दवा के चूर्ण को 10 ग्राम शहद एवं
10 ग्राम गौमूत्र अर्क के साथ रात्रि में सोते समय लें। लगातार
रोग पूर्णरूपेण सही होने तक लें। इस दवा के खाने से पतले दस्त लग
सकते हैं, उस स्थिति में दवा की मात्रा कम कर दें पर दवा रोके
नहीं। यह दवा मरीज के बलाबल के अनुसार कम या ज्यादा
मात्रा में दी जा सकती हैं। इससे कैंसर की गांठ शरीर के किसी
भी हिस्से में होगी सही होगी व कैंसर का घाव भी सही होता
है।
2- कैंसर नासक जड़ी-
सहस्रमुरिया का एक पौधा प्रतिदिन पानी में पीसकर
साथ में 10 ग्राम शहद व 15 नग तुलसी पत्र व 10 ग्राम गौमूत्र
अर्क को मिलाकर सुबह खाली पेट रोगी को खिलायें। यह दवा
लगातार रोग सही होने तक दें। शरीर के किसी भी अंग में कैंसर
की गाठं या घाव को सही करती है। साथ ही रक्तरोहेड़ा की
छाल 2 तोला को 100 ग्राम पानी में धीमी आंच में पकाकर,
जब वह पानी 25 ग्राम रह जाय तो उसे शाम को सोते समय 10
ग्राम शुद्ध शहद व 10 ग्राम गौमूत्र अर्क के साथ मिलाकर
पिलायें, रोग सही होने तक। रोगी पूर्ण धैर्य व विश्वास के साथ
ही दवा का सेवन करें लाभ जरूर होगा।
नोट- इसी रक्तरोहेड़ा की आयुर्वेद में रोहितारिष्ट नाम से दवा
बनाई जाती है।
3- गेंहूँ के जवारे से कैंसर का नास
सिद्ध मकरध्वज 5 ग्राम, कृमि मुदगरस 5 ग्राम, सितोपलादि
चूर्ण 60 ग्राम, मुक्ता पिष्टी 3 ग्राम, त्रणकान्तमणि पिष्टी
10 ग्राम, अभ्रकभस्म सहस्त्रपुटी 5 ग्राम, महायोगराज गुग्गुल 5
ग्राम, श्रृंगभस्म 2 ग्राम, हीरक भस्म 5 मि,ग्रा., स्वर्ण भस्म 5
मि.ग्रा., नीम गिलोय सत्व 10 ग्राम, इन सभी दवाओं को
पीसकर मिला लें एवं 120 पुड़िया बना लें। एक पुड़िया दवा को
20 ग्राम गेंहूँ के जवारे का रस, 10 ग्राम शुद्ध शहद, 10 ग्राम
गौमूत्र अर्क, 15 पत्ते तुलसी के साथ सुबह खाली पेट दवा दें। दवा
की मात्रा रोगी के अनुसार कम या ज्यादा की जा सकती हैं।
इससे शरीर में कही भी गांठ या घाव हो, सही होता है।
परहेज-
शराब, मांस, बीड़ी, सिगरेट, तम्बाकू, गांजा आदि किसी
भी तरह का नशा, गुटका, पान-मसाला, ज्यादा तली चीजें,
अचार, लालमिर्च आदि का सेवन न करें।
नोट - मरीज को दवाओं की पहचान न होने की वजह से इन
दवाओं का सेवन किसी योग्य वैद्य की देख-रेख में ही लें। किसी
दवा का गलत तरीके से सेवन हानिकारक भी हो सकता है इसके
लिये लेखक जिम्मेदार नहीं होगा।

Saturday, 28 November 2015

संतान गोपाल मन्त्र :

सन्तान गोपाल मंत्र:
सन्तान गोपाल मंत्र दूर करेगा हर संतान बाधा...........
...........................................................................
......................
.शास्त्रों में संतान कामना को पूरा करने के ऐसे ही उपाय बताए
गए हैं, जिनसे बिना किसी ज्यादा परेशानी या आर्थिक बोझ
के मनचाही खुशियां मिलती हैं। यह उपाय है संतान गोपाल
मन्त्र का जप। स्वस्थ्य, सुंदर संतान खासतौर पर पुत्र प्राप्ति के
लिए यह मंत्र पति-पत्नी दोनों के द्वारा किया जाना बेहतर
नतीजे देता है। संतान गोपाल मंत्र: देवकीसुत गोविन्द वासुदेव
जगत्पते। देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत:।। संतान गोपाल मंत्र
जप की विधि -पति-पत्नी दोनों सुबह स्नान कर पूरी पवित्रता
के साथ उपरोक्त मंत्र का जप तुलसी की माला से करें।इसके लिए
घर के देवालय में भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र की
चन्दन, अक्षत, फूल, तुलसी दल और माखन का भोग लगाकर घी के
दीप व कर्पूर से आरती करें।बालकृष्ण की मूर्ति विशेष रूप से श्रेष्ठ
मानी जाती है।भगवान की पूजा के बाद या आरती के पहले
उपरोक्त संतान गोपाल मंत्र का जप करें।मंत्र जप के बाद भगवान
से समर्पित भाव से निरोग, दीर्घजीवी, अच्छे चरित्रवाला,
सेहतमंद पुत्र की कामना करें।यह मंत्र जप पति या पत्नी अकेले
भी कर सकते हैं।धार्मिक मान्यताओं में इस मंत्र की 55 माला
या यथाशक्ति जप के एक माह में चमत्कारिक फल मिलते हैं।
Devakisutam Govindam Vasudevam JagatpatimDehim-
Tanayam Krishna-twa-maham Saranagatah.
Remarks: Meditate on Lord Krishna rising from the sea in a
chariot with Arjuna and bringing a baby son (to us). It is
best to start this mantra in a Holy place near the sea,
preferably Puri as the mantra specifically refus to the
Jagannath Rupa (form) with the word “Jagatpatim”. One
lakh Japa followed by a proper pooja as described above
gives an illustrious and dutiful son.
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते देहि
मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ।=======================
Om Shreeng Hreeng Kleeng Glaung Devakisut Govind
Vasudev Jagatpate Dehi Me Tanayam Krishn Tvaamaham
Sharanam Gatah ।
जीवनमें सफलता प्राप्त करने के लिए एक अच्छे संतान की
आवश्यकता होती हैं। परन्तु-कुछ लोग संतान विहीन होते हैं और
संतान की प्राप्ति के लिए अनेक प्रयास करते हैं। ऐसी स्थिति
में संतान प्राप्ति हेतु यह यंत्र अत्यन्त चमत्कारिक है। इस यंत्र की
प्रतिष्ठा पूजा करने से मनोवांछित संतान की प्राप्ति होती
है। और वह दीर्घायु और गुणवान होता है।
संतान गोपाल यंत्र की साधना अत्यन्त प्रसिद्ध है जिन्हें संतान
नहीं उत्पन्न होती है वे बालकृष्ण की मूर्ति के साथ संतान
गोपाल यंत्र स्थापित करते हैं तथा उनके सामने संतानगोपाल
स्तोत्र का पाठ करते हैं। कुछ लोग ’पुत्रोष्टि यज्ञ’ करते हैं
पुत्रेष्टि यज्ञ एवं संतान गोपाल यंत्र के द्वारा अवश्य ही संतान
की प्राप्ति होती है।यंत्र का उपयोगसंतान गोपाल यंत्र को
गुरुपुष्य नक्षत्र में पूजन एवं प्रतिष्ठा करने के पश्चात् संतान
गोपाल स्त्रोत्र का पाठी करने से शीघ्र ही गृह में कुलीन एवं
अच्छे गुणों से युक्त संतान की उत्पत्ति होती है तथा माता
पिता की सेवा में ऐसी संतानें हमेशा तत्पर रहती हैं।संतान
गोपाल यंत्र को गोशाला में प्रतिष्ठित करके गोपालकृष्ण का
मंत्र का जप श्रद्धापूर्वक करने से वध्या को भी शीघ्र ही
पुत्ररत्न उत्पन्न होता है तथा सभी गुणों से सम्पन्न होता है।
मनुष्य धन-सम्पत्ति बढ़ाने में जितना ध्यान देता है उतना संतान
पैदा करने में नहीं देता यदि शास्त्रोक्त रीति से शुभ मुहूर्त में
गर्भाधान कर संतानप्राप्ति की जाय तो वह परिवार व देश का
नाम रोशन करनेवाली सिद्ध होगी उत्त्म संतानप्राप्ति के
लिए सर्वप्रथम पति-पत्नी का तन-मन स्वस्थ होना चाहिए वर्ष
में केवल एक ही बार संतानोत्पत्ति हेतु समागम करना हितकारी
हैगर्भाधान के लिए समय:ॠतुकाल की उत्तरोत्तर रात्रियों में
गर्भाधान श्रेष्ठ है लेकिन 11वीं व 13वीं रात्रि वर्जित हैयदि
पुत्र की इच्छा हो तो पत्नी को ॠतुकाल की 8, 10, 12, 14 व
16वीं रात्रि में से किसी एक रात्रि का शुभ मुहूर्त पसंद कर
समागम करना चाहिएयदि पुत्री की इच्छा हो तो ॠतुकाल
की 5, 7, 9 या 15वीं रात्रि में से किसी एक रात्रि का शुभ
मुहूर्त पसंद करना चाहिएकृष्णपक्ष के दिनों में गर्भ रहे तो पुत्र व
शुक्लपक्ष में गर्भ रहे तो पुत्री पैदा होती हैरजोदर्शन दिन को
हो तो वह प्रथम दिन गिनना चाहिए सूर्यास्त के बाद हो तो
सूर्यास्त से सूर्योदय तक के समय के तीन समान भाग कर प्रथम दो
भागों में हुआ हो तो उसी दिन को प्रथम दिन गिनना चाहिए
रात्रि के तीसरे भाग में रजोदर्शन हुआ हो तो दूसरे दिन को
प्रथम दिन गिनना चाहिएनिषिद्ध रात्रियाँ: पूर्णिमा,
अमावस्या, प्रतिपदा, अष्टमी, एकादशी, चतुर्दशी, सूर्यग्रहण,
चंद्रग्रहण, ऊत्तरायण, जन्माष्टमी, रामनवमी, होली,
शिवरात्रि, नवरात्रि आदि पर्वों की रात्रि, श्राद्ध के दिन,
चतुर्मास, प्रदोषकाल, क्षयतिथि (दो तिथियों का समन्वय
काल) एवं मासिक धर्म के चार दिन समागम नहीं चाहिए
शास्त्रवर्णित मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करना
चाहिएज्यातिष शास्त्रो के आधर पर देखा जाये तो हमे
ज्ञातहोता है संतान के सम्बन्ध्ा में क्या करना चाहिए हमारे
पुर्वजो ने जो खोज कि है यदि उन्हे अपनाया जाये तो सफलता
अवशय प्राप्त होती हैं ज्यातिष शास्त्रो के कुछ सूत्र माता
पिता की मृत्युतिथि, स्वयं की जन्मतिथि, नक्षत्रों की संधि
(दो नक्षत्रों के बीच का समय) तथा अश्विनी, रेवती, भरणी,
मघा, मूल इन नक्षत्रों में समागम वर्जित हैदिन में समागम करने से
आयु व बल का बहुत ह्रास होता है गर्भाधान हेतु सप्ताह के 7
दिनों की रात्रियों के शुभ समय इस प्रकार हैं :रवि >> 8 से 9 >>
1.30 से 5सोम >> 10.30 se 12 >> 1.30 से 4मंगल >> 7.30 से 9
>> 10.30 से 1.30बुध >> 7.30 से 10 >> 3 से 4.30गुरु >> 12 से
1.30 >> 3 से 4शुक्र >> 9 से 10.30 >> 12 से 3.30शनि >> 9 से
12रात्रि के शुभ समय में से भी प्रथम 14 व अंतिम 15 मिनट का
त्याग करके बीच का समय गर्भाधान के लिए निश्चित
करेंगर्भधारण के पूर्व कर्तव्यरात्रि तथा समय कम-से-कम तीन
दिन पूर्व निश्चित कर लेना चाहिए निश्चित रात्रि में शाम
होने से पूर्व पति-पत्नी को स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनकर सदगुरु
व इष्टदेवता की पूजा करनी चाहिए संभव हो तो हवन करना
चाहिएगर्भाधान एक प्रकार का यज्ञ है इसलिए इस सतत यज्ञ
की भावना रखनी चाहिए, विलास की दृष्टि नहीं रखनी
चाहिएपति-पत्नी दोंनो को अपनी चित्तवृत्तियाँ परमात्मा
में स्थिर करनी चाहिए व उत्तम आत्माओं को प्रार्थना करते हुए
उनका आह्वान करना चाहिए :’हे ब्रह्माण्ड में विचरण कर रहीं
सूक्ष्म रूपधारी पवित्र आत्माओं ! हम दोंनो आपको प्रार्थना
कर रहे हैं कि हमारे यहाँ जन्म धारण करके हमें कृतार्थ करें हम
दोंनो अपने शरीर, मन, प्राण व बुद्धि को आपके योग्य बानायेंगे
’पुरुष दायें पैर से स्त्री से पहले शय्या पर आरोहण करे और स्त्री
बायें पैर से पति के दक्षिण पार्श्व में श्य्या पर चढ़े तत्पश्चात
शय्या पर निम्नलिखित मंत्र पढ़ना चाहिए :अहिरसि आयुरसि
सर्वतः प्रतिष्ठासि धाता त्वां दधातु विधाता त्वां दधातु
ब्रह्मवर्चसा भवेतिब्रह्मा बृहस्पतिर्विष्णुः सोम
सूर्यस्तथाऽश्विनौ भगोऽथ मित्रावरुणौ वीरं ददतु मे सुतम्‘हे
गर्भ ! तुम सूर्य के समान हो तुम मेरी आयु हो, तुम सब प्रकार से
मेरी प्रतिष्ठा हो धाता (सबके पोषक ईश्वर) तुम्हारी रक्षा
करें, विधाता (विश्व के निर्माता ब्रह्मा) तुम्हारी रक्षा करें
तुम ब्रह्मतेज से युक्त होओब्रह्मा, बृहस्पति, विष्णु, सोम, सूर्य,
अश्विनीकुमार और मित्रावरुण जो दिव्य शक्तिरूप हैं, वे मुझे
वीर पुत्र प्रदान करेंचरक संहिता, शारीरस्थान : 8.8दोंनो गर्भ
विषय में मन लगाकर रहें ऐसा करने से तीनों दोष अपने-अपने
स्थानों में रहने से स्त्री बीज ग्रहण करती है विधिपूर्वक
गर्भधारण करने से इच्छानुकूल फल प्राप्त होता है ।

Tuesday, 7 July 2015

#स्वक्ष भारत अभियान :-

आदरणीय
प्रधान मंत्री जी !

#स्वक्ष भारत अभियान को शहर में पूरा करने हेतु कृपया ध्यान दें......

प्रधान मंत्री जी !

    शहर अथवा गाँव के बाजार में किराये-दारी पर दुकान करने वाले लोगों मे से लगभग 75%प्रतिशत दुकानदारों को मकान मालिक ने शौचालय उपलब्ध नहीं करवाया है, क्या कोई कानून है जिसमे किराया पर दूकान वही दे सकता जो किराये -दारों को पानी और शौचालय
की सुबिधा सुनिश्चित करे ,सुबिधा न होने और सरकार द्वारा सुलभ शौचालय की सुबिधा तो केवल शहर में आगंतुक यात्री के लिए ही किसी तरह हो पाती है या उसमे भी कम पड़ जाता है ,मेरा ये सरकार से निवेदन है कि जितने भी मकान मालिक अपनी दुकान किराए पर दिए हैं दुकान से पैसा कमा रहे हैं ,वो किरायेदारों को पानी और शौचालय जरुर उपलब्ध कराएँ ताकि दुकानदारों को खुले में शौच न करना पड़े ।

नगर निगम से सर्वे करवाएं ताकि गन्दगी फैलने पर रोक लगे ,उन्हें प्रोत्साहित करें कानून के मुताबिक दण्डित भी करें ।

इस सुबिधा से वंचित सभी दुकानदार आपको आशीर्वाद देंगे ।

धन्यवाद ।

Thursday, 14 May 2015

Vitiligo

Vitiligo

Vitiligo Treatment - Overview
Vitiligo is a common condition in which the skin loses the
pigment that determines its color. Also commonly known as
Leucoderma (leuco = white and derma = skin), this condition
is characterized by irregular pale or milky white patches on
the skin.
Vitiligo is one of those conditions that have more of a social
significance than medical. Although it affects people of all
races, the symptoms are often more prominently seen in
people with a darker complexion. This condition has been the
cause of stress for millions of affected people worldwide as
well as their near and dear ones.
Our experience of successfully treating more than 45,000
cases of skin enables us to ensure you of a safe and
scientific solution for an effective Vitiligo treatment. So, go
ahead and experience a lasting solution that comes to you
without side effects.
What is Vitiligo?
Before we get to understand about the loss of color from the
skin in Vitiligo, let us first see how the skin gets its normal
color. A pigment called melanin imparts the skin (as well as
hair) the native color. This pigment is produced in cells
called 'melanocytes'. When the melanocytes die or are unable
to function, it results in loss of melanin causing color-less,
white patches on the skin.
Vitiligo is a chronic disorder and tends to run a variable and
often unpredictable course. It affects up to 2% of the
population globally and the incidence is almost double this (3
to 4%) in India and Mexico. People of different races,
religions, ethnic groups, socio-economic groups and with
different dietary habits are affected by this condition.
Vitiligo affects males and females equally and it is commonly
seen in children as well. The incidence is higher in children
whose both parents are affected by Vitiligo. By and large,
people who develop it are between 10 to 30 years of age and
most of those who develop this, do so before 40 years of
age.
The goal of most treatment options available today is largely
to stop or slow down the progression of pigment loss and to
attempt the re-pigmentation in affected areas.
Vitiligo Causes
The underlying mechanism which causes Vitiligo is loss of
melanin. This occurs due to destruction of existing
melanocytes and defective formation of new melanocytes.
However, the precise reason for white spot on skin that is
loss of melanin and what causes the destruction of these
pigment-forming cells is not completely understood.
A combination of auto-immune, genetic and environmental
factors has been seen as Vitiligo causes, in most cases.
Recent studies have demonstrated that Vitiligo may also be
caused by stress which affects the immune system, leading
the body to react and mistakenly destroy the melanocytes by
releasing antibodies against them.
Heredity has been strongly proposed as one of the Vitiligo
cause, since many cases with Vitiligo do report incidence of
this condition (or other auto-immune disorders) in their
family. Research has also shown the NALP1 gene to be the
trigger in predisposing people to Vitiligo.
Additionally, Vitiligo is said to be associated with (and
affecting people with) certain auto-immune and inflammatory
diseases such as:
Hypothyroidism - Under -functioning of thyroid gland
Hyperthyroidism - Over -functioning of thyroid gland
Diabetes mellitus
Addison's disease
Alopecia areata
Psoriasis
Pernicious anemia
Possible things that can trigger Vitiligo in an individual who
is genetically prone include:
Skin trauma
Sun burn
Emotional stress
Skin rash
Exposure to de-pigmenting chemicals - the disease can
later spread beyond areas of contact via immune-mediated
mechanism. Phenolic/catecholic derivatives are the prime
chemicals causing this.
All said and done, the exact reason why Vitiligo affects some
people and not others, and that too with such
unpredictability, still remains unexplored!
Vitiligo Symptoms
As one of the key Vitiligo symptom, a sudden onset is seen
in most cases where the patient notices a single, few or
many milky white patches of irregular shapes and sizes on
the skin. Small areas of de-pigmentation gradually start
spreading to involve larger areas of the body. The patches
appear more prominent in dark-skinned people and can be
quite disfiguring at times.
As far as the progress and reasons for white spot on skin are
concerned, it is highly unpredictable. Some cases experience
an extremely fast advancement with quick involvement of
large areas of the body whereas in some cases there may be
few small patches that don't change much with time. The
active phase of development of new patches can be followed
by a phase where there are no new patches.
The affected areas retain the normal sensitivity to touch and
pain; however sun-sensitivity is seen to be increased in
many cases. Other Vitiligo symptom may be that the hair
over the affected parts, such as skin, scalp, beard, eyebrows,
eyelashes, etc. may also lose colour.
Over a period of time, some of the Vitiligo patches may re-
pigment by themselves.
The patches of Vitiligo can affect any part of the body
though sun-exposed regions, body folds (e.g. groins,
armpits), areas around body orifices or sites of previous
injury are commonly affected. Following are some of the
common patterns of body affection seen in Vitiligo patients:
Focal: The patches are limited to particular areas of the
body
Segmental: The distribution of the patches is usually
asymmetrical affecting one side of body
Symmetrical: Bilaterally symmetrical patches over the body
Generalized: Widespread patches spread all over the body
Over Bony Prominences: The skin near the joints is affected
by the patches
Lip-tip Vitiligo: Vitiligo that is limited to the lips, tips of
the fingers and toes, fingertips
Genital Vitiligo : The private parts of the body are affected
Diagnosis
The look of Vitiligo is typical enough to diagnose it on the
first look. In addition, your medical and family history will
enable your physician to make sure of his diagnosis.
However, certain tests may be conducted to confirm the
condition as well as to ascertain the cause if possible:
Biopsy of the affected area can confirm the diagnosis of
Vitiligo
Blood tests may be done:
To check the thyroid functions
To look for the presence of anti-nuclear antibodies (that
would point towards auto-immune cause)
To rule out pernicious anemia
Examination of the spots under Wood's lamp can be used
to diagnose and evaluate Vitiligo especially when the
changes are not appreciated with the naked eye.
At Dr. Batra's, we scientifically evaluate each case of Vitiligo
with Wood's lamp and effectively use it for the following:
To accurately diagnose Vitiligo
To rule out fungal infections
To measure extent of the disease
To detect early changes that are not visible to naked eyes
To monitor response to treatment
Psychological Impact
Vitiligo can be socially devastating for afflicted individuals
and it has a significant psychological impact on patients. It
can cause feelings of being shunned by the society or being
singled out due to the disfigurement that is often seen in this
condition. In certain countries like India, these patients often
face discrimination especially at the time of marriage.
Sometimes Vitiligo can even be a ground for divorce if the
patient develops it after marriage.
Vitiligo patients often feel awkwardness in public places and
for some it is even hard to move around without developing
feelings of embarrassment. Long term sufferers are more
prone to fall prey to depression, anxiety and feelings of low
self esteem. Many are constantly on the watch as to how the
opposite person will react to their looks. Thus, it has
significant negative effects on the self-image of a person, his
quality of life and self esteem.
For some people, Vitiligo might even be a limitation in
pursuing the career of their choice or marrying the person
they like. Such people must be encouraged to come out of
their shells and to lead a healthy life that does not give too
much significance to looks. They must be explained the
significance of pursuing whatever they want in life with full
confidence because suffering from Vitiligo does not change
the kind of personality they have. Regular counseling may be
required for those few who do not improve in spite of all
these steps.
Homeopathic treatment
Recent studies conducted in University of Toronto and
published in the BioMed Central journal of Dermatology have
clearly demonstrated evidence of benefits of orally taken
Ginkgo biloba in the treatment of Vitiligo. This is a known
homeopathic drug and besides some others drugs, it has
been successfully used in the treatment of Vitiligo.
In another clinical study conducted by the AKP Homoeopathic
Clinical Center, 259 Vitiligo patients had improved out of 629
patients included in the study and 42 Leucoderma patients
had benefited out of 97 patients. Thus research has also
demonstrated the effectivity of Homeopathy in a difficult
condition such as Vitiligo.
We have the expertise of treating more than 45,000 skin
cases successfully over last 50 years and we can ensure you
of a safe and scientific solution for your Vitiligo. The
treatment is primarily aimed at stopping or slowing down the
further destruction of melanocytes and stimulating the re-
pigmentation in the existing patches. Our team of expert
homeopaths, dermatologists and nutritionists work in unison
to ensure the best for every case we treat.
The scope of homeopathic treatment extends beyond the
physical symptoms and the approach is more holistic in
nature. It also addresses the underlying stress and depression
that is often seen in many cases. Thus, the treatment goes a
step further and works towards re-integrating the patient into
normal life.
Prognosis with Homeopathic treatment depends on certain
criteria such as the location, duration, extent of spread and
the disease activity. It also depends on the general health of
the patients and the presence of other systemic illnesses
such as thyroid disorders, auto-immune diseases, etc. Vitiligo
over bony prominences, around lips, on tips of fingers and
toes and generalized extensive Vitiligo show slow
improvement. Even after starting the treatment, patient may
notice occurrence of some new spots; however, this is
because it takes some time to control the disease activity and
balance the immune system.
The medicines prescribed are known to be safe without any
adverse effects and the patients are not advised any
particular dietary restriction which is otherwise a common
case with most of the alternative treatments available in the
market.
Additionally, we follow certain international medical protocols
set by our dermatologists to monitor the improvement of the
Vitiligo patients:
Appearance of the Trichome sign (pale pink color
development in the patches)
Re-pigmentation around the follicles
Concavity of the borders of the affected patch
Apart from all this, our qualified and experienced nutritionists
formulate a personalized diet chart to give the Vitiligo
patients valuable dietary help. Thus treatment is truly holistic
in every sense of the word and is different from the
superficial nature of conventional treatments for Vitiligo.
Brief overview of Conventional treatment options for Vitiligo:
The conventional methods aim at treating Vitiligo by altering
its appearance without addressing the underlying cause. The
treatment varies from the patches being hidden by cosmetic
camouflage solutions to application of cortico-steroidal
creams to phototherapy. Camouflage solutions also include
tattooingof the affected patch. However, it is often difficult to
match the exact color and the patches also tend to spread in
spite of the tattooing.
Phototherapy is another option available but this carries a
risk of causing sun burn as well as skin cancer. Lastly,
surgical procedures are also opted for by many patients and
include grafting of the skin on the affected patches but again
these cannot be performed in extensive and generalized
Vitiligo and carry the risk of scarring apart from its cost
value.
Self Care Tips
Based on our expertise and experience of treating thousands
of cases over the last 50 years, we have seen patients being
helped with certain changes in their diet and lifestyle. These
have been clinically verified by us repeatedly and have a
scientific backing as well. Here are some points that Vitiligo
patients can put to good use:
Exposing the affected areas to early morning sunlight just
after sunrise is known to stimulate pigment forming cells.
However, patients must avoid strong sunlight especially
between 10 am to 4 pm. If necessary to move out during
such hours, patients must opt for a sunscreen with SPF
(Sun Protection Factor) of more than 30.
Regular use of sun screen also guards against sunburn and
long term damage
Use mild soap for bathing and avoid rubbing skin
vigorously after a bath (friction can trigger new patches)
Wear clothing that adequately covers the skin (e.g. full
sleeved shirt) - this protects the skin from any kind of
external trauma
Avoid direct contact with deodorants, perfumes - spray on
clothes rather than directly on skin
Avoid mental stress - take effective steps to identify and
tackle with stress, if it exists
Diet rich in copper is suggested for Vitiligo patients since
scientific studies have shown low serum copper levels in
patients suffering from Vitiligo. Green leafy vegetables and
sesame are good sources of copper.
Supplementation with vitamin B12, folic acid and
pantothenic acid has been seen to have beneficial effects
in Vitiligo patients (it has been credited with the formation
of new melanin). Patients should include adequate lentils,
eggs and yogurt in their daily diet for the same.
Facts and Myths
Myth: Vitiligo is contagious.
Fact: It is not contagious and cannot be passed on through
contact. Click here to read about what causes Vitiligo.
Myth: Vitiligo increases after consuming milk and other white
foods.
Fact: It is an auto immune disease which has no direct
relation to food.
Myth: Will my child also get it?
Fact: Researches claim that it does not get carried to the
progeny, however strong hereditary tendencies cannot be
denied.
Myth: Does the disease stop spreading as the treatment
starts?
Fact: It can't be guaranteed as it takes time to build the
immune system and by the time the immune system is built,
few new spots might appear which recover as the treatment
proceeds.
Myth: No new spots come after the stoppage of the
treatment.
Fact: Generally speaking no new spots occur but there are
certain cases of extreme stress or compromised immunity
wherein the spots may recur, however these can be taken
care of and controlled by the treatment.