Tuesday, 11 March 2025

पेशाब रुक जाना

*कभी पेशाब रुक जाए तो क्या करें*           
*वृद्धावस्था महिला पुरुष के लिए बहुत ही महत्त्व पूर्ण पोस्ट है।*
*यह एक प्रसिद्ध एलोपैथी चिकित्सक 70 वर्षीय ईएनटी विशेषज्ञ का अनुभव है।*  
आइए सुनते हैं अनुठा अनुभव..  

               एक सुबह वे अचानक उठे।  उन्हें मुत्रत्याग करने की जरूरत थी, लेकिन वे कर नहीं सके (कुछ लोगों को बाद की उम्र में कभी-कभी यह समस्या होती है)। उन्होंने बार-बार कोशिश की, लेकिन लगातार कोशिश नाकाम रही। तब उन्होंने महसूस किया कि एक समस्या खड़ी हो गयी है।

एक डॉक्टर होने के नाते, वे ऐसी शारीरिक समस्याओं से अछूते नहीं थे; उनका निचला पेट भारी हो गया। बैठना या खड़े़ रहना दुस्वार होने लगा, तल-पेट में दबाव बढ़ने लगा ।

तब उन्होंने एक जाने-माने यूरोलॉजिस्ट को फोन पर बुलाया और स्थिति के बारे में बताया।  मूत्र-रोग विशेषज्ञ ने उत्तर दिया: "मैं इस समय एक बाहरी क्षेत्र के अस्पताल में हूँ, और आपके क्षेत्र के क्लिनिक में दो घंटे में पहुँच पाऊँगा। क्या आप इतने लंबे समय तक इसका सामना कर सकते हैं?"
उन्होंने उत्तर दिया: "मैं कोशिश करूँगा।"
उसी समय, उन्हें बचपन की एक अन्य एलोपैथिक महिला-डॉक्टर का ध्यान आया। बड़ी मुश्किल से उन्होंने अपनी दोस्त-डाक्टर को स्थिति के बारे में बताया।
उस सहेली ने उत्तर दिया:-  *"ओह, आपका मूत्राशय भर गया है। और कोशिश करने पर भी आप मुत्रत्याग कर नहीं पा रहे... चिंता न करें। जैसा मैं बता रही हूं, वैसा ही करें। आप इस समस्या से छुटकारा पा जाएंगे।"*  
और उसने निर्देश दिया:- 
"सीधे खड़े हो जाइये, और जोर से बार-बार कूदिये। कूदते समय दोनों हाथों को ऊपर यूॅं उठाए रखें, मानो आप किसी पेड़ से आम तोड़ रहे हों। ऐसा 10 से 15 बार करें।"
बूढ़े डॉक्टर ने सोचा: "क्या? सचमुच मैं इस स्थिति में कूद पाऊंगा? इलाज थोड़ा संदिग्ध लग रहा था। फिर भी डॉक्टर ने कोशिश की... 
3 से 4 बार छलांग लगाने पर ही उन्हें पेशाब की तलब लगी और उन्हें राहत मिल गयी।  
 उन्होंने इतनी सरल विधि से समस्या को हल करने के लिए अपनी मित्र डॉक्टर को सहर्ष धन्यवाद दिया। 
अन्यथा, उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ता, मूत्राशय की जाॅंच, इंजेक्शन, एंटीबायोटिक्स आदि के साथ साथ कैथेटर डालना होता... उनके और करीबी लोगों के लिए मानसिक तनाव के साथ लाखों का बिल भी होता।
 
कृपया वरिष्ठ नागरिकों के साथ साझा करें। इस असहनीय अनुभव वाले किसी भी व्यक्ति के लिए यह एक बहुत ही सरल उपाय है.... 

सभी *वरिष्ठ नागरिक* (55 से ऊपर की उम्र के) कृपया अवश्य पढ़ें, हो सकता है आपके लिए फायदेमंद हो .. 
           
*आप जानते हैं कि मन चाहे कितना ही जोशीला हो पर साठ की उम्र पार होने पर यदि आप अपनेआप को फुर्तीला और ताकतवर समझ जबते हों तो यह गलत है।  वास्तव में ढलती उम्र के साथ शरीर उतना ताकतवर और फुर्तीला नहीं रह जाता।*

आपका शरीर ढलान पर होता है, जिससे ‘हड्डियां व जोड़ कमजोर होते हैं, पर *कभी-कभी मन भ्रम बनाए रखता है कि ‘ये काम तो मैं चुटकी में कर लूँगा’।*  पर बहुत जल्दी सच्चाई सामने आ जाती है मगर एक नुकसान के साथ।

सीनियर सिटिजन होने पर जिन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए, ऐसी कुछ टिप्स दे रहा हूं। 

 -- *धोखा तभी होता है जब मन सोचता है कि ‘कर लूंगा’ और शरीर करने से ‘चूक’ जाता है।  परिणाम एक एक्सीडेंट और शारीरिक क्षति!*
ये क्षति फ्रैक्चर से लेकर ‘हेड इंज्यूरी’ तक हो सकती है।  यानी कभी-कभी जानलेवा भी हो जाती है।

-- *इसलिए जिन्हें भी हमेशा हड़बड़ी में काम करने की आदत हो, बेहतर होगा कि वे अपनी आदतें बदल डालें।*

*भ्रम न पालें, सावधानी बरतें क्योंकि अब आप पहले की तरह फुर्तीले नहीं रहे।*

छोटी सी चूक कभी बड़े नुक़सान का कारण बन जाती है।

-- *सुबह नींद खुलते ही तुरंत बिस्तर छोड़ खड़े न हों, क्योंकि आँखें तो खुल जाती हैं मगर शरीर व नसों का रक्त प्रवाह पूर्ण चेतन्य अवस्था में नहीं हो पाता ।*

अतः पहले बिस्तर पर कुछ मिनट बैठे रहें और पूरी तरह चैतन्य हो लें।  कोशिश करें कि बैठे-बैठे ही स्लीपर/चप्पलें पैर में डाल लें और खड़े होने पर मेज या किसी सहारे को पकड़कर ही खड़े हों। अक्सर यही समय होता है डगमगाकर गिर जाने का।

-- गिरने की सबसे ज्यादा घटनाएं बाथरुम/वॉशरुम या टॉयलेट में ही होती हैं।  आप चाहे अकेले हों, पति/पत्नी के साथ या संयुक्त परिवार में रहते हों लेकिन बाथरुम में अकेले ही होते हैं।

-- *यदि आप घर में अकेले रहते हों, तो और अधिक सावधानी बरतें क्योंकि गिरने पर यदि उठ न सके तो दरवाजा तोड़कर ही आप तक सहायता पहुँच सकेगी, वह भी तब जब आप पड़ोसी तक समय से सूचना पहुँचाने में सफल हो सकेंगे।*
— *याद रखें बाथरुम में भी मोबाइल साथ हो ताकि वक्त जरुरत काम आ सके।*

-- देशी शौचालय के बजाय हमेशा यूरोपियन कमोड वाले शौचालय का ही इस्तेमाल करें।  यदि न हो तो समय रहते बदलवा लें, इसकी तो जरुरत पड़नी ही है, अभी नहीं तो कुछ समय बाद।

संभव हो तो कमोड के पास एक हैंडिल लगवा लें।  कमजोरी की स्थिति में इसे पकड़ कर उठने के लिए ये जरूरी हो जाता है।

बाजार में प्लास्टिक के वेक्यूम हैंडिल भी मिलते हैं, जो टॉइल जैसी चिकनी सतह पर चिपक जाते हैं, पर *इन्हें हर बार इस्तेमाल से पहले खींचकर जरूर जांच-परख लें।*

-- *हमेशा आवश्यक ऊँचे स्टूल पर बैठकर ही नहायें।*

बाथरुम के फर्श पर रबर की मैट जरूर बिछाकर रखें ताकि आप फिसलन से बच सकें।

-- *गीले हाथों से टाइल्स लगी दीवार का सहारा कभी न लें, हाथ फिसलते ही आप ‘डिस-बैलेंस’ होकर गिर सकते हैं।*

-- बाथरुम के ठीक बाहर सूती मैट भी रखें जो गीले तलवों से पानी सोख ले।  कुछ सेकेण्ड उस पर खड़े रहें फिर फर्श पर पैर रखें वो भी सावधानी से। 

-- *अंडरगारमेंट हों या कपड़े, अपने चेंजरूम या बेडरूम में ही पहनें।  अंडरवियर, पाजामा या पैंट खडे़-खडे़ कभी नहीं पहनें।*

हमेशा दीवार का सहारा लेकर या बैठकर ही उनके पायचों में पैर डालें, फिर खड़े होकर पहनें, वर्ना दुर्घटना घट सकती है।

*कभी-कभी स्मार्टनेस की बड़ी कीमत चुकानी पड़ जाती है।*

-- अपनी दैनिक जरुरत की चीजों को नियत जगह पर ही रखने की आदत डाल लें, जिससे उन्हें आसानी से उठाया या तलाशा जा सके।

*भूलने की आदत हो, तो आवश्यक चीजों की लिस्ट मेज या दीवार पर लगा लें, घर से निकलते समय एक निगाह उस पर डाल लें, आसानी रहेगी।*

-- जो दवाएं रोजाना लेनी हों, उनको प्लास्टिक के प्लॉनर में रखें जिससे जुड़ी हुई डिब्बियों में हफ्ते भर की दवाएँ दिन-वार के साथ रखी जाती हैं।

*अक्सर भ्रम हो जाता है कि दवाएं ले ली हैं या भूल गये।प्लॉनर में से दवा खाने में चूक नहीं होगी।*

-- *सीढ़ियों से चढ़ते उतरते समय, सक्षम होने पर भी, हमेशा रेलिंग का सहारा लें, खासकर ऑटोमैटिक सीढ़ियों पर।*

ध्यान रहे अब आपका शरीर आपके मन का *ओबिडियेंट सरवेन्ट* नहीं रहा।

— बढ़ती आयु में कोई भी ऐसा कार्य जो आप सदैव करते रहे हैं, उसको बन्द नहीं करना चाहिए। 

कम से कम अपने से सम्बन्धित अपने कार्य स्वयं ही करें।

— *नित्य प्रातःकाल घर से बाहर निकलने, पार्क में जाने की आदत न छोड़ें, छोटी मोटी एक्सरसाइज भी करते रहें। नहीं तो आप योग व व्यायाम से दूर होते जाएंगे और शरीर के अंगों की सक्रियता और लचीला पन कम होता जाएगा।  हर मौसम में कुछ योग-प्राणायाम अवश्य करते रहें।*

— *अपना पानी, भोजन, दवाई इत्यादि स्वयं लें जिससे शरीर में सक्रियता बनी रहे।*

बहुत आवश्यक होने पर ही दूसरों की सहायता लेनी चाहिए। 

— *घर में छोटे बच्चे हों तो उनके साथ अधिक समय बिताएं, लेकिन उनको अधिक टोका-टाकी न करें। 

-- *ध्यान रखें कि अब आपको सब के साथ एडजस्ट करना है न कि सब को आपसे।*

-- इस एडजस्ट होने के लिए चाहे, बड़ा परिवार हो,  छोटा परिवार हो या कि पत्नी/पति हो, मित्र हो, पड़ोसी या समाज।

*एक मूल मंत्र सदैव उपयोग करें।*    
    
1. *नोन* अर्थात नमक।  भोजन के प्रति स्वाद पर नियंत्रण रखें।   

2. *मौन*  कम से कम एवं आवश्यकता पर ही बोलें।   

3. *कौन* (मसलन कौन आया  कौन गया, कौन कहां है, कौन क्या कर रहा है) अपनी दखलंदाजी कम कर दें।                 

*नोन, मौन, कौन* के मूल मंत्र को जीवन में उतारते ही *वृद्धावस्था* प्रभु का वरदान बन जाएगी जिसको बहुत कम लोग ही उपभोग कर पाते हैं। 

*कृपया इस संदेश को अपने घर, रिश्तेदारों, आसपड़ोस के वरिष्ठ सदस्यों को भी अवश्य प्रेषित करें।*🌹❤️              
   *जिन्हें सुबह या रात में सोते समय  पेशाब करने जाना पड़ता हैं उनके लिए विशेष सूचना!!*

        हर एक व्यक्ति को इसी साढ़े तीन मिनिट में सावधानी बरतनी चाहिए।

*यह इतना महत्व पूर्ण क्यों है?*
        यही साढ़े तीन मिनिट अकस्माक होने वाली मौतों की संख्या कम कर सकते हैं।

        जब जब ऐसी घटना हुई हैं, परिणाम स्वरूप तंदुरुस्त व्यक्ति भी रात में ही मृत पाया गया हैं।
स्नान करते वक्त पहले अपने नाभी पर एक मग पानी डाले फिर पैरों पर बाद मे स्नान की क्रिया चालु करे
        ऐसे लोगों के बारे में हम कहते हैं, कि कल ही हमने इनसे बात की थी। ऐसा अचानक क्या हुआ? यह कैसे मर गया?

       इसका मुख्य कारण यह है कि रात मे जब भी हम मूत्र विसर्जन के लिए जाते हैं, तब अचनाक या ताबड़तोब उठते हैं, परिणाम स्वरूप मस्तिष्क तक रक्त नही पहुंचता है।

       यह साढ़े तीन मिनिट बहुत महत्वपूर्ण होते हैं।

      मध्य रात्रि जब हम पेशाब करने उठते है तो हमारा ईसीजी का पैटर्न बदल सकता है। इसका कारण यह है, कि अचानक खड़े होने पर मस्तिष्क को रक्त नहीं पहुच पाता और हमारे ह्रदय की क्रिया बंद हो जाती है।

   साढ़े तीन मिनिट का प्रयास एक उत्तम उपाय है।

1. *नींद से उठते समय आधा मिनिट गद्दे पर लेटे हुए रहिए।*

2. *अगले आधा मिनिट गद्दे पर बैठिये।*

3. *अगले अढाई मिनिट पैर को गद्दे के नीचे झूलते छोड़िये।*

   साढ़े तीन मिनिट के बाद  और ह्रदय की क्रिया भी बंद नहीं होगी! इससे अचानक होने वाली मौतें भी कम होंगी।

     आपके प्रियजनों को लाभ हो अतएव सजग करने हेतु अवश्य प्रसारित करे।
                 
            *धन्यवाद!!*

Saturday, 9 September 2023

DENGUE FEVER

DENGUE FEVER:- डेंगू बुखार मच्छरों द्वारा प्रेषित एक वायरल संक्रमण है, विशेष रूप से एडीज मच्छर। यह भारत में एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंता का विषय है, जिसमें हर साल हजारों मामले सामने आते हैं और कई लोग इस खतरनाक बीमारी से अपनी जान गंवा ते हैं। डेंगू बुखार के चेतावनी संकेतों को पहचानना जल्दी पहचान और समय पर उपचार के लिए महत्वपूर्ण है। इस लेख में, हम डेंगू बुखार के चेतावनी संकेतों पर विचार करेंगे। 

 डेंगू बुखार क्या है? 

    डेंगू बुखार एक वायरल संक्रमण है जो संक्रमित मच्छरों के काटने से फैलता है, मुख्य रूप से एडीज एजिप्टी मच्छर। यह एक वैश्विक स्वास्थ्य चिंता है, विशेष रूप से भारत जैसे उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में। डेंगू वायरस चार प्रकार के होते हैं, अर्थात् DEN-1, DEN-2, DEN-3 और DEN-4.    प्रत्येक प्रकार हल्के से गंभीर लक्षण पैदा कर सकता है। डेंगू के लक्षण और चेतावनी संकेत डेंगू बुखार के चेतावनी संकेतों को पहचानना महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्रारंभिक पहचान और शीघ्र उपचार जटिलताओं को रोक सकता है। यहां देखने के लिए लक्षण और चेतावनी संकेत दिए गए हैं: • तेज बुखार: आमतौर पर 104 डिग्री फ़ारेनहाइट (40 डिग्री सेल्सियस) से ऊपर तेज बुखार की अचानक शुरुआत, डेंगू बुखार के पहले लक्षणों में से एक है। 

• गंभीर सिरदर्द: तीव्र सिरदर्द, विशेष रूप से आंखों के पीछे, शुरुआती चरणों में हो सकता है। 

जोड़ों और मांसपेशियों में दर्द: जोड़ों, मांसपेशियों और हड्डियों में गंभीर दर्द आम है, जिससे डेंगू बुखार को इसका उपनाम "ब्रेकबोन बुखार" दिया जाता है। 

• दाने: कुछ दिनों के बाद त्वचा पर एक दाने दिखाई दे सकते हैं, आमतौर पर अंगों पर शुरू होते हैं और शरीर के बाकी हिस्सों में फैलते हैं।

 • लगातार उल्टी: उल्टी जो समय के साथ बंद नहीं होती है या खराब हो जाती है। • गंभीर पेट दर्द: पेट में तीव्र दर्द जो आंतरिक रक्तस्राव का संकेत दे सकता है। 

मसूड़ों से खून आना: प्लेटलेट काउंट में कमी के कारण मसूड़ों से खून आना या आसानी से चोट लगना हो सकता है। • तेजी से सांस लेना: सांस लेने में कठिनाई या तेजी से सांस लेना श्वसन संकट का संकेत हो सकता है। 

  • थकान: अत्यधिक थकान या सुस्ती जो आराम करने के बावजूद बनी रहती है। डेंगू का निदान डेंगू बुखार का निदान नैदानिक मूल्यांकन और रक्त परीक्षण के संयोजन के माध्यम से किया जाता है। जब आप संदिग्ध डेंगू बुखार के लक्षणों के साथ एक स्वास्थ्य देखभाल पेशेवर से मिलते हैं, तो वे आपके चिकित्सा इतिहास की सावधानीपूर्वक जांच करेंगे और एक शारीरिक परीक्षा करेंगे। डॉक्टर लक्षणों की शुरुआत, हाल ही में यात्रा के इतिहास और मच्छरों के किसी भी संपर्क के बारे में पूछेंगे। डेंगू बुखार के निदान की पुष्टि करने के लिए रक्त परीक्षण सबसे विश्वसनीय तरीका है। उपयोग किए जाने वाले रक्त परीक्षण के दो मुख्य प्रकार हैं: 

पोलीमरेज़ चेन रिएक्शन (पीसीआर) टेस्ट: यह परीक्षण आपके रक्त में डेंगू वायरस की उपस्थिति का पता लगाता है। यह बीमारी के पहले कुछ दिनों के दौरान सबसे प्रभावी है।

 • एंटीबॉडी टेस्ट: यह परीक्षण डेंगू वायरस के जवाब में आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा उत्पादित एंटीबॉडी का पता लगाता है। यह बीमारी के 5-7 दिनों के बाद सबसे सटीक है। डेंगू का इलाज एक बार डेंगू बुखार का निदान होने के बाद, उपचार के विकल्प जो आपके लक्षणों को कम करने और वसूली में तेजी लाने में मदद कर सकते हैं, उनमें शामिल हैं: 

आराम: आपके शरीर को संक्रमण से लड़ने और ठीक होने की अनुमति देने के लिए भरपूर आराम करना आवश्यक है।

 • हाइड्रेशन: पानी, मौखिक पुनर्जलीकरण समाधान और इलेक्ट्रोलाइट युक्त पेय जैसे तरल पदार्थ पीना, तेज बुखार और उल्टी के कारण निर्जलीकरण को रोकने के लिए महत्वपूर्ण है। • दर्द प्रबंधन: एसिटामिनोफेन (पेरासिटामोल) जैसे ओवर-द-काउंटर दर्द निवारक बुखार को कम करने और डेंगू बुखार से जुड़े मांसपेशियों में दर्द और जोड़ों के दर्द से राहत देने में मदद कर सकते हैं। जब डेंगू बुखार के गंभीर मामलों की बात आती है, तो तत्काल चिकित्सा की तलाश करना महत्वपूर्ण है। उत्पन्न होने वाली जटिलताओं का प्रबंधन करने के लिए अस्पताल में भर्ती और विशेष चिकित्सा देखभाल अक्सर आवश्यक होती है। गंभीर डेंगू के लिए आमतौर पर उपयोग किए जाने वाले कुछ चिकित्सा हस्तक्षेप यहां दिए गए हैं: 

अंतःशिरा तरल पदार्थ: अत्यधिक पसीने और तेज बुखार के कारण निर्जलीकरण हो सकता है। अंतःशिरा तरल पदार्थ द्रव संतुलन को बहाल करने और जटिलताओं को रोकने के लिए प्रशासित किए जाते हैं। 

रक्त आधान: कुछ मामलों में, डेंगू से प्लेटलेट काउंट में कमी हो सकती है, जो रक्त के थक्के को प्रभावित कर सकती है। प्लेटलेट्स को फिर से भरने और थक्के समारोह में सुधार करने के लिए रक्त आधान की आवश्यकता हो सकती है।

  • सहायक उपचार: गंभीर डेंगू अंग क्षति या शिथिलता का कारण बन सकता है। सांस लेने में कठिनाई के साथ सहायता के लिए ऑक्सीजन थेरेपी जैसे सहायक उपचार प्रदान किए जा सकते हैं। 

• दवाएं: डेंगू बुखार के लिए कोई विशिष्ट एंटीवायरल दवा नहीं है। हालांकि, तेज बुखार और जोड़ों के दर्द जैसे लक्षणों को प्रबंधित करने के लिए दर्द निवारक और एंटीपीयरेटिक जैसी दवाएं निर्धारित की जा सकती हैं।

  • निगरानी: अस्पताल में भर्ती होने के दौरान, महत्वपूर्ण संकेतों की लगातार निगरानी, पूर्ण रक्त गणना, और अन्य पैरामीटर रोग की प्रगति का आकलन करने और उचित प्रबंधन सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं। 

डेंगू की रोकथाम 

1. मच्छर नियंत्रण के उपाय डेंगू बुखार को रोकने के लिए, मच्छरों की आबादी को नियंत्रित करना आवश्यक है। यहां कुछ प्रभावी रोकथाम रणनीतियां दी गई हैं: 

• खड़े पानी को हटा दें: नियमित रूप से खाली कंटेनर और उन क्षेत्रों को साफ करें जहां मच्छर प्रजनन करते हैं, जैसे कि फूलों के बर्तन, वॉटर कूलर और फेंके गए टायर। 

• कीट विकर्षक का उपयोग करें: मच्छरों को दूर भगाने के लिए उजागर त्वचा पर डीईईटी, पिकारिडिन, या नींबू नीलगिरी के तेल युक्त कीट विकर्षक लागू करें। 

• सुरक्षात्मक कपड़े पहनें: उजागर त्वचा को कम करने के लिए लंबी आस्तीन की शर्ट, लंबी पैंट, मोजे और जूते के साथ कवर करें। 

• मच्छरदानी के नीचे सोएं: सोते समय मच्छरदानी का उपयोग करें, खासकर उन क्षेत्रों में जहां डेंगू बुखार की उच्च घटनाएं होती हैं।

 2. सामुदायिक जुड़ाव जागरूकता बढ़ाने और निवारक उपाय करने में पूरे समुदाय को शामिल करके, हम इस संभावित जीवन-धमकी वाली बीमारी की घटनाओं को काफी कम कर सकते हैं। यहां कुछ रणनीतियां और पहल हैं जो सामुदायिक भागीदारी के महत्व को उजागर करती हैं: 

• जागरूकता अभियान: डेंगू बुखार, इसके लक्षणों और निवारक उपायों के बारे में समुदाय को शिक्षित करने के लिए नियमित जागरूकता अभियान चलाना आवश्यक है। इन अभियानों को सोशल मीडिया, स्थानीय समाचार पत्रों और सामुदायिक बैठकों जैसे विभिन्न प्लेटफार्मों के माध्यम से आयोजित किया जा सकता है।

• सफाई अभियान: समुदाय को सफाई अभियान में शामिल करना डेंगू वायरस ले जाने वाले मच्छरों के लिए प्रजनन स्थल को खत्म करने का एक प्रभावी तरीका है। व्यक्तियों को स्थिर पानी के लिए नियमित रूप से अपने परिवेश का निरीक्षण करने और किसी भी संभावित मच्छर प्रजनन स्थलों का निपटान करने के लिए प्रोत्साहित करें। 

• सामुदायिक भागीदारी: स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों को डेंगू बुखार के संदिग्ध मामलों की रिपोर्ट करने में समुदाय के सदस्यों को सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करें। समय पर रिपोर्टिंग से प्रकोपों को जल्दी से पहचानने और रोकने में मदद मिल सकती है। 

• स्थानीय अधिकारियों के साथ सहयोग: प्रभावी वेक्टर नियंत्रण उपायों को लागू करने के लिए समुदाय के सदस्यों और स्थानीय अधिकारियों के बीच सहयोग को बढ़ावा देना। इसमें नियमित रूप से फॉगिंग, लार्वानाशक और उचित अपशिष्ट प्रबंधन प्रथाओं को सुनिश्चित करना शामिल है। जटिलताओं और दीर्घकालिक प्रभाव डेंगू बुखार एक गंभीर बीमारी है जो ठीक से प्रबंधित नहीं होने पर विभिन्न जटिलताओं का कारण बन सकती है। इस बीमारी से जुड़ी संभावित जटिलताओं और दीर्घकालिक प्रभावों के बारे में पता होना महत्वपूर्ण है। 

1. डेंगू की जटिलताएं अंग क्षति: डेंगू बुखार के गंभीर मामले यकृत, हृदय और अन्य महत्वपूर्ण अंगों को प्रभावित कर सकते हैं। यदि तुरंत इलाज नहीं किया जाता है तो यह अंग विफलता का कारण बन सकता है। 

• रक्तस्रावी बुखार: कुछ मामलों में, डेंगू बुखार अधिक गंभीर रूप में प्रगति कर सकता है जिसे डेंगू रक्तस्रावी बुखार (डीएचएफ) कहा जाता है। इससे आंतरिक रक्तस्राव, कम प्लेटलेट काउंट और अंग की शिथिलता हो सकती है। 

• डेंगू शॉक सिंड्रोम: डीएचएफ आगे चलकर डेंगू शॉक सिंड्रोम (डीएसएस) में प्रगति कर सकता है, जो रक्तचाप में अचानक गिरावट की विशेषता है। यह जीवन के लिए खतरा हो सकता है और तत्काल चिकित्सा ध्यान देने की आवश्यकता होती है। 2. डेंगू के दीर्घकालिक प्रभाव

• पोस्ट-डेंगू थकान सिंड्रोम: कुछ व्यक्तियों को डेंगू बुखार से उबरने के बाद भी लंबे समय तक थकान का अनुभव हो सकता है। यह हफ्तों या महीनों तक बना रह सकता है, दैनिक गतिविधियों और जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है। 

• प्रतिरक्षा प्रणाली की शिथिलता: अध्ययनों से पता चला है कि डेंगू बुखार प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रभावित कर सकता है, जिससे व्यक्ति भविष्य में अन्य संक्रमणों के लिए अतिसंवेदनशील हो सकते हैं। 

• गंभीर डेंगू का खतरा बढ़ जाता है: यदि आपको पहले डेंगू बुखार हुआ है, तो आपको बाद के संक्रमणों पर बीमारी के गंभीर रूपों के विकास का अधिक खतरा है। बच्चों और गर्भवती महिलाओं में डेंगू बुखार डेंगू बुखार एक वायरल बीमारी है जो बच्चों और गर्भवती महिलाओं सहित सभी उम्र के लोगों को प्रभावित कर सकती है। ध्यान में रखने के लिए यहां कुछ महत्वपूर्ण बिंदु दिए गए हैं: बच्चों के लिए बच्चे हमेशा अपने लक्षणों को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने में सक्षम नहीं हो सकते हैं, इसलिए माता-पिता को सतर्क रहने की आवश्यकता है।

  • तेज बुखार, गंभीर सिरदर्द, आंखों के पीछे दर्द, जोड़ों और मांसपेशियों में दर्द, दाने और रक्तस्राव जैसे चेतावनी संकेतों की तलाश करें। 

• सुनिश्चित करें कि आपके बच्चे को भरपूर आराम मिलता है और हाइड्रेटेड रहने के लिए बहुत सारे तरल पदार्थ पीते हैं। 

• एस्पिरिन या इबुप्रोफेन देने से बचें क्योंकि वे रक्तस्राव के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। इसके बजाय, बुखार और दर्द से राहत के लिए एसिटामिनोफेन का उपयोग करें। 

•गर्भवती महिलाओं के लिए गर्भवती महिलाएं जो डेंगू बुखार का अनुबंध करती हैं, उन्हें तत्काल चिकित्सा ध्यान देना चाहिए। • वायरस संभावित रूप से मां और अजन्मे बच्चे दोनों को नुकसान पहुंचा सकता है। 

• तेज बुखार, तेज सिरदर्द और शरीर में दर्द जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। 

• गर्भवती महिलाओं को भी हाइड्रेटेड रहना चाहिए और भरपूर आराम करना चाहिए। समाप्ति शीघ्र चिकित्सा की तलाश करने के लिए डेंगू बुखार के चेतावनी संकेतों से अवगत होना महत्वपूर्ण है।

 कुछ सबसे आम चेतावनी संकेतों में तेज बुखार, सिरदर्द, शरीर में दर्द, दाने, थकान, मतली और सूजन लिम्फ नोड्स शामिल हैं। यदि आप इनमें से किसी भी लक्षण का अनुभव करते हैं, तो तुरंत चिकित्सा ध्यान देना महत्वपूर्ण है। याद रखें, शुरुआती पहचान और उपचार डेंगू बुखार को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने में महत्वपूर्ण अंतर ला सकते हैं। डेंगू में निर्जलीकरण को रोकने के लिए, उपाय करना आवश्यक है । 

होम्योपैथिक दवा- Rhus tox 30 Eupatorium perf 30 Gels-30  Carica papaya, Echinacea Q, Cherata Q आदि यदि एक शिक्षित चिकित्सक के माध्यम से दिया जाय तो काफी लाभ हो सकता है ।

http://eka.care/doctor/bipin-bihari-mishraDengue fever

Saturday, 21 January 2023

Sciatica

Sciatica:-
कटिस्नायुशूल:

यह दर्द जांघ, पैर और पैर के पीछे और बाहर नीचे की ओर दौड़ता है, यह रीढ़ के आधार पर sciatic Nerv के संपीड़न (दबाव) का परिणाम है। 
कारण:-
    यह खराब Posture (मुद्रा) , में बैठने, मांसपेशियों में तनाव, गर्भावस्था, मोटापा, स्लिप्ड डिस्क और साइटिक तंत्रिका  में सूजन के कारण हो सकता है।

लक्षण:

अचानक शुरू होने वाला दर्द, नितंब से होते हुए, जांघ के पिछले हिस्से से नीचे और पैर के पिछले हिस्से से होते हुए पैर तक। 
      दर्द तेज या सुस्त शूटिंग या जलन, निरंतर या एपिसोडिक हो सकता है और आमतौर पर आगे झुकने पर और ज्यादा होता है। प्रभावित हिस्से का सुन्न होना और कमजोरी भी एक लक्षण है।

ध्यान:

तनाव और लचीलेपन के नुकसान को रोकने के लिए अपनी Posture (मुद्रा) में सुधार करें जो दर्द का पूर्वाभास करता है। नियमित व्यायाम से मांसपेशियों की टोन में सुधार करें।
भोजन:
वसा और कार्बोहाइड्रेट में कटौती करें। 
प्रोटीन का सेवन बढ़ाएं। 
विटामिन को विशेष रूप से शामिल करें
आहार में बी कॉम्प्लेक्स और ई । 
पीठ के किसी भी झटकेदार यात्रा से बचें। 
सामान उठाने के लिए झुकें नहीं बल्कि घुटने टेकें व सख्त गद्दे पर सोएं।

   दर्द वाली जगह पर बर्फ लगाने से दर्द से राहत मिल सकती है। पीठ और जांघों की मालिश करवाएं। लंबे समय तक या गंभीर लक्षणों के लिए होम्योपैथिक डॉक्टर से परामर्श लें ।
दवा:
मित्रो ! जैसा कि आप जानते हैं होम्योपैथी में कोई दवा बीमारी के नाम से नहीं होती बल्कि दवा का चुनाव लक्षणों के अनुसार होता है फिर भी कुछ मुख्य दवाएं निम्नलिखित हैं ।
 1-रस टॉस
2-ब्रायोनिया
3-आईरिस
4-कोलॉयन्थिस
 5-नैफेलियम
आदि दवाएँ जो लक्षणानुसार दी जाएं तो बहुत ही लाभ प्रदान करती हैं ।

Friday, 20 January 2023

Kideney Stone

#गुर्दे_की_पथरी:-
#Kideney_Stone:-
#Homoeopathic_Treatment :-
#Homoepathic_Doctor:-
#Varanasi
मित्रों ! आज मुझे 14 mm की गुर्दे की पथरी को होम्योपैथिक चिकित्सा द्वारा बाहर निकालने में मदद मिली...मुंबई में रहने वाले मरीज ने खुश होकर ये तस्वीर अभी भेंजा है, सोच रहा था आप लोगो को शेयर करूँ ।

यदि आप या आपका कोई परिचित क्लीनिक पर आने की सोच रहे हैं ...पर समय नहीं मिल पा रहा है कोई बात नहीं ...
आपकी दवा आपके घर पहुँच जाएगी ...
नोट:- ये सेवा अभी वाराणसी सहित पूरे भारतवर्ष में उपलब्ध है ।
       If you are thinking of coming to the clinic...but can't find the time, no problem...
Your medicine will be delivered to your home...
Note:- This service is currently available all over India including Varanasi.
Click here 👇
http://eka.care/doctor/bipin-bihari-mishra
:Dr Bipin Bihari Mishra (Homoeopath)

Thursday, 15 December 2022

घमौनी :- (SUN BATHING)


           वैसे ठंडी के मौसम में तेल लगाकर मगरमच्छ की तरह धूप लेना काफी फायदे मंद होता है .....

     जब कोहरे की चादर में से सूरज की लाली दिखती है तो उसमें नहाने को जी करता है। दरअसल, धूप के बहुत फायदे हैं। वहीं धूप के साथ अगर शरीर की मालिश हो जाए तो क्या कहने, लेकिन धूप कितनी चाहिए, कब चाहिए, मालिश कैसे करें, कौन-सा तेल उपयोग करना है। ? 

जाड़ों की नर्म धूप और आंगन में लेट कर...', गुलजार साहब ने जब यह लिखा था तो घरों में आंगन और आंगन में धूप की मौजूदगी आम थी, लेकिन अब शहर में घरों में धूप बहुत कम ही नसीब होती है। अगर धूप मिल भी जाए तो आंगन मिलना मुश्किल है। बहरहाल, आंगन न मिले तो बालकनी ही सही, जाड़ों में धूप सेंकने का जुगाड़ जरूर लगाएं। जब धूप कुछ लम्हों के लिए ही मिले तो भी उसका फायदा पूरे शरीर को मिलना चाहिए। इसके लिए कुछ बातों का ध्यान रखना बहुत जरूरी है।

धूप की तपिश के फायदे:-

    गर्म होता है


शरीर: अग्नि (ऊष्मा) का मुख्य सोर्स होने के कारण सूर्य की रोशनी ठंड से सिकुड़े शरीर को गर्माहट देती है, जिससे शरीर के भीतर की ठंडक और पित्त की कमी दूर होती है। आयुर्वेद में सनबाथ को 'आतप सेवन' नाम से जाना जाता है।

मिलता है विटामिन डी: विटामिन डी शरीर में हड्डी की मजबूती के लिए अहम है। इस विटामिन का जरूरी नेचरल सोर्स सूर्य की रोशनी ही है। शरीर में उचित मात्रा में विटामिन डी मौजूद होने पर ही शरीर कैल्शियम का अवशोषण कर पाता है।

        बढ़ती है इम्यूनिटी :-    सूरज की रोशनी में ऐसे चमत्कारी गुण होते हैं, जिनके कारण शरीर पर विभिन्न प्रकार के इन्फेक्शंस के असर की आशंका कम हो जाती है। इससे शरीर की इम्यूनिटी मजबूत होती है। धूप के सेवन से शरीर में WBC का पर्याप्त निर्माण होता है जो रोग पैदा करने वाले कारकों से लड़ने का काम करते हैं। 

         बचाव कैंसर से:- सूरज की किरणों से शरीर को कैंसर से लड़ने वाले तत्व मिलते हैं। इससे कैंसर का खतरा टलता है तो जिन्हें कैंसर है उन्हें भी लाभ होता है।

        ठीक होता है पाचन: आयुर्वेद के अनुसार, शरीर में पाचन का कार्य जठराग्नि द्वारा किया जाता है, जिसका मुख्य स्रोत सूर्य है। दोपहर (12 बजे के आसपास) में सूर्य अपने चरम पर होता है और उस समय तुलनात्मक रूप से जठराग्नि भी ज्यादा सक्रिय होती है। इसलिए कहा जाता है कि इस समय लिया गया भोजन अच्छी तरह से पचता है।

         बनते हैं पॉजिटिव हॉर्मोन: आपको अच्छा महसूस कराने वाले हॉर्मोन सेरेटॉनिन और एंडोर्फिन का धूप के असर से शरीर में पर्याप्त स्राव होता है, जोकि डिप्रेशन, सीजनल अफेक्टिव डिसऑर्डर, साइकॉलजिकल-इमोशनल हेल्थ और बॉडी क्लॉक-रिद्म के संतुलन में फायदेमंद है।

फायदे और भी हैं:-

       धूप सेंकने से नींद नहीं आने की समस्या दूर होती है क्योंकि धूप का सीधा असर हमारे पीनियल ग्लैंड पर होता है। यह ग्लैंड शरीर में मेलाटोनिन नामक हॉर्मोन बनाता है। एक ऐसा पावरफुल एंटी-ऑक्सीडेंट मेलाटोनिन हमारी नींद की क्वॉलिटी तय करता है और डिप्रेशन को भी दूर रखता है।

-सुबह की धूप सेंकने से त्वचा संबंधी कई लाभ भी होते हैं। धूप सेंकने से खून साफ होता है और फंगल प्रॉब्लम, एग्जिमा, सोरायसिस और स्किन संबंधी दूसरी कई बीमारियां दूर होती हैं। यह बीपी को कम करने में भी मदद करती है।

कितनी देर हो धूप से मिलना चाहिए :-

  धूप का भरपूर लाभ लेने के लिए सप्ताह में कम से कम 3-4 बार सुबह (10:30 से 12 बजे) या ढलती दोपहर (3 से 5 बजे तक) से 20 से 30 मिनट गुनगुनी धूप में बैठना अच्छा माना जाता है।

-बच्चों में कफ ज्यादा बनता है। ऐसे में उनके लिए सुबह 10 बजे के बाद ही धूप सेवन अच्छा रहता है क्योंकि सुबह में कुछ ठंड ज्यादा रहती है।

-बुजुर्गों के लिए दोपहर का समय धूप सेंकने के लिए ज्यादा लाभदायक माना जा सकता है।

-पर्याप्त विटामिन डी के लिए गोरे लोगों को सांवले या काले रंग के लोगों के मुकाबले कम समय धूप सेंकने की ज़रूरत होती है। सामान्य रंग वाले व्यक्ति 30 मिनट, गोरे रंग वाले 15-20 मिनट जबकि सांवले या काले रंग वाले व्यक्ति को 30 मिनट से ज्यादा धूप सेवन करना चाहिए।

धूप से ज्यादा मिलन परेशानी का सबब भी

-समय तक धूप में बैठने से पिग्मेंटेशन, स्किन एलर्जी, स्किन कैंसर, एजिंग इफेक्ट, कालापन, डिहाइड्रेशन, आंखों की परेशानी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। वैसे भी अति हर चीज की बुरी होती है। इसलिए जितना बताया गया है, उतना ही समय धूप में बैठना चाहिए।

-शरीर में त्वचा का रंग तय करने वाले मैलेनिन, हिमोग्लोबिन और केरोटिन जैसे कुछ तत्व होते हैं। ज्यादा धूप में लगातार रहने से कुछ लोगों में अल्ट्रावॉयलेट किरणों के प्रभाव से इनका उत्पादन गड़बड़ाने लगता है। इससे कुछ समय बाद स्किन के टैन होने का खतरा बढ़ जाता है।

सन टैन यानी धूप का स्याह रंग:-

धूप में ज्यादा बैठने से सन टैन (धूप की वजह से त्वचा का काला पड़ना) की समस्या हो सकती है। यहां इस बात को जानना जरूरी है कि धूप के प्रति लोगों की संवेदनशीलता अलग-अलग हो सकती है। किसी को 20 मिनट धूप में रहने से भी यह हो सकती है, वहीं किसी को 1 घंटे में भी नहीं होती। जब जाड़ों की धूप स्किन को परेशान करने लगे तो धूप से हटना सही विकल्प रहेगा।

जब सन टैन हो जाए तो...

-आयुर्वेद के अनुसार, समान गुणों वाली चीजें लेने से उन गुणों में वृद्धि होती है जबकि विपरीत गुणों वाली चीजें लेने से कमी होती है। ऐसे में परेशानी होने पर पित्त या गर्मी बढ़ाने वाली चीजों से बचना चाहिए यानी प्राकृतिक रूप से ठंडी प्रकृति वाली चीजों का उपयोग करना फायदेमंद रहता है।

* प्रभावित हिस्से को धूप के संपर्क से बचाएं। तेज धूप में शरीर को स्कार्फ, चश्मा, कैप, फुल स्लीव शर्ट या छाते की सहायता से सुरक्षित रखें।

* 2 से 3 लीटर या फिर जरूरत के हिसाब से पानी पीएं।

* प्रभावित भाग पर एलोवेरा का पल्प या जेल, खीरा या कच्चे आलू की स्लाइस या रस, चंदन का पेस्ट, गुलाब जल, बेसन-हल्दी का पेस्ट या मसूर दाल का पेस्ट कच्चे दूध या गुलाब जल में तैयार कर लगाएं।

* नारियल तेल तेल का प्रयोग भी लाभदायक है।

1. सरसों का तेल

-ब्लड सर्कुलेशन में सुधार।

-त्वचा का सॉफ्ट होना।

-मांसपेशियों से तनाव को दूर करना।

-सर्दियों में धूप में सरसों तेल की मालिश से शरीर में सूर्य की किरणों से मिलने वाला विटामिन-डी अच्छी तरह समा जाता है।

-सरसों तेल से स्वेट ग्लैंड्स ऐक्टिव हो जाते हैं जिससे शरीर के विषैले तत्व आसानी से बाहर निकल जाते हैं। बिना तेल मालिश के सन बाथ लेने से भी ऐसा ही होता है।

-सरसों के तेल में एंटीबैक्टीरियल, एंटीफंगल और एंटीवायरल गुण होते हैं। इससे मालिश से त्वचा के इन्फेक्शन दूर हो जाते हैं। सरसों के तेल में विटामिन-ई भी होता है जिससे त्वचा की झुर्रियां आदि दूर हो जाती हैं।

-सरसों के तेल की तासीर गर्म होती है। सर्दियों में इसके इस्तेमाल से सर्दी से भी बचाव होता है।

2. तिल का तेल:-

-इस तेल में अल्ट्रावायलेट किरणों से शरीर की रक्षा करने का प्राकृतिक गुण होता है। नियमित रूप से इसके उपयोग से सूर्य की किरणों के सीधे संपर्क में रहने के बावजूद किरणों के हानिकारक प्रभाव से रक्षा होती है। इससे बढ़ती उम्र का त्वचा पर असर कम दिखाई देता है।

-हवा में मौजूद प्रदूषण और धुएं के दुष्प्रभावों से भी रक्षा करता है।

-यह अपने एंटीबैक्टीरियल और एंटीइन्फ्लैमेट्री गुणों के कारण सभी तरह की त्वचा के लिए सुरक्षित होता है।

-इसमें कॉपर, मैंगनीज, कैल्शियम और मैग्नीशियम मौजूद होते हैं। साथ ही, इसमें एंटीऑक्सीडेंट भी पाए जाते हैं जिनसे यह आसानी से त्वचा में समाकर इसे मुलायम बना देता है।

-तिल के तेल में विटामिन ई, विटामिन बी कॉम्प्लेक्स और विटामिन डी की मात्रा ज्यादा होती है जो शरीर के लिए बहुत ही जरूरी माने जाते हैं।

3. अतिबला के तेल में खूब है बल:-

-आयुर्वेद में अतिबला (काकही या भारतीय मॉलो) और बला से बने तेल को नर्वस सिस्टम के सभी तरह के विकारों, जोड़ों की दर्द, मांसपेशियों की जकड़न, लंबी बीमारी के बाद की कमजोरी दूर करने में कारगर माना जाता है। यह चेहरे के लकवे की दशा में कारगर माना गया है।

4. दूसरे खास तेल:-

-अलसी का तेल जोड़ों के दर्द में उपयोगी है।

-बादाम और अखरोट के तेल से त्वचा की कोमलता और चमक बनी रहती है। इनसे झुर्रियां और झाइयां दूर होती हैं।

-शरीर में दर्दों को दूर करने के लिए सरसों के तेल में अजवाइन या लहसुन पकाकर मालिश करना भी अच्छा माना जाता है।

ये हैं फायदे :-

-तेल मालिश से शरीर में ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है। इससे शरीर और दिमाग की थकान दूर होती है।

-तेल मालिश हल्के हाथों से धीरे-धीरे करनी चाहिए, इससे शरीर की सिंकाई भी हो जाती है और मालिश भी।

डॉ बिपिन बिहारी मिश्र

"परमानंद होम्योक्लीनिक" ककरमत्ता वाराणसी 

मोबाइल नं-9415812261

Sunday, 23 October 2022

Pimples :-(मुंहासा )

मुंहासा 

 यह वसामय ग्रंथियों (तेल-स्रावित ग्रंथियों) और बालों के रोम की सूजन की बीमारी है। यह व्हाइटहेड्स, ब्लैकहेड्स और पस्ट्यूल द्वारा विशेषतया होता है। स्कारिंग होना आम है और आमतौर पर एक तैलीय निर्वहन से जुड़ा होता है।


 1:-कारण:

 

  • कारण पूरी तरह से समझा नहीं गया है, लेकिन संभावित कारण हो सकते हैं:
  • वंशागति
  • हार्मोनल असंतुलन विशेषतः यौवन के दौरान
  • स्वच्छता का अभाव
  • अनुचित आहार
  • तनाव
  • कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स जैसी दवाएं


2.आहार, प्रबंधन:

 A.जिन पदार्थों से बचना है:-

 • वसा और तैलीय भोजन से बचें।

• चॉकलेट, आइसक्रीम, मक्खन, केक, सफेद ब्रेड, मिठाई और तले हुए भोजन से बचें।

• मांसाहारी भोजन का सेवन सीमित करें।




• अपने पिंपल्स को न तोड़ें, इससे सेकेंडरी इंफेक्शन हो जाएगा।

• अपने चेहरे पर सुगंधित साबुन और रसायनों का प्रयोग न करें।


B. करना क्या चाहिए :-

• अपने चेहरे को बार-बार धोएं, दिन में कम से कम 5 बार, इस बात का ध्यान रखें कि यह ज्यादा रूखा न हो जाए।

• गैर-चिकना मेकअप का प्रयोग करें या यदि संभव हो तो सौंदर्य प्रसाधन न लगाएं।

• रासायनिक वस्तुओं की तुलना में प्राकृतिक क्लीन्ज़र का उपयोग करें:

बेसन (चना) और उसमें थोड़ी हल्दी मिलाकर चेहरा धो लें.

  •  ताजे खीरे से त्वचा की मालिश करें, इससे त्वचा पर ठंडक का असर होता है।

 आप ताजे फलों से भी अपने चेहरे की मालिश कर सकते हैं।

• आप सूजन और संक्रमण को कम करने के लिए चेहरे की भाप ले सकते हैं, केवल 15 मिनट और एक पखवाड़े तक।

• योग का अभ्यास करें - यह आपके परिसंचरण को बेहतर बनाने में मदद करेगा।


 C.उपभोग करना:

 • खूब सारा पानी पीओ।

• फलों का रस, नारियल पानी खूब पिएं।

• ढेर सारे ताजे फल और कच्ची सब्जियां खाएं।

• अपने आहार में फाइबर का सेवन बढ़ाएं - साबुत अनाज, चोकर, जई, हरी पत्तेदार सब्जियां, कच्ची सब्जियां, सलाद, सूखे मेवे और ताजे फल।

• मैदा की बजाय साबुत अनाज खाएं।

• संभवत: उबला हुआ या हल्का पका हुआ खाना खाएं, न कि अत्यधिक तेलीय भोजन।

• आहार में जिंक का सेवन बढ़ाएं:

- शंख, बीफ और अन्य रेड मीट, अंडे और समुद्री भोजन, बीफ, पोर्क, चिकन (डार्क मीट), टर्की (डार्क मीट), दूध और दूध उत्पाद, नट्स, समुद्री पौधे विशेष रूप से जापानी समुद्री पौधे।

• विटामिन ए से भरपूर आहार का सेवन करें:

• मछली, अंडा, दूध और दूध उत्पादों, मांस, मछली, गुर्दे और जिगर के जिगर का तेल।

• पीले नारंगी रंग के फल और सब्जियां; और हरी पत्तेदार सब्जियां - कैरोटीन का अच्छा स्रोत हैं।

• विटामिन सी से भरपूर भोजन का सेवन करें:

• दूध और दुग्ध उत्पाद, खट्टे फल, हरी सब्जियां।

• ताजे फल और सब्जियों में विटामिन सी की अधिकतम मात्रा होती है।

• विटामिन ई का सेवन बढ़ाएं।

• गेहूं के बीज, साबुत अनाज, मक्का, अनाज, दालें, मेवा, गहरे हरे पत्तेदार सब्जियां, जैतून।

• तिलहन और वनस्पति तेल। आप वयस्कों के लिए 22.5 IU (15 मिलीग्राम) विटामिन ई की खुराक ले सकते हैं।

• खाना पकाने के लिए अन्य तेलों को सूरजमुखी के तेल से बदलें क्योंकि यह विटामिन ई का सबसे समृद्ध स्रोत है।

• अपने भोजन में थोड़ी हल्दी शामिल करें; यह आपकी त्वचा के लिए फायदेमंद है ।

इसके साथ ही, अपने नजदीक अच्छे होम्योपैथिक चिकित्सक से संपर्क करें स्वयं अपने से इलाज न करें ।

संपर्क करें :-👇

डॉ बिपिन बिहारी मिश्र

मोबाइल नं:-9415812261

http://eka.care/doctor/bipin-bihari-mishra

Friday, 21 October 2022

Tonsilitis:- (टॉन्सिलाइटिस)

 Tonsilitis:-

 

टॉन्सिल शरीर के रक्षा तंत्र का एक हिस्सा हैं और श्वसन संक्रमण को रोकने के लिए रक्षा की पहली पंक्ति हैं।


टॉन्सिल में उस वायरस के कारण सूजन हो सकती है जिसके खिलाफ बच्चे ने अभी तक प्रतिरोध विकसित नहीं किया है और 'स्ट्रेप्टोकोकी' जैसे बैक्टीरिया के कारण भी।

लक्षण:

 गले में दर्द और जलन।

लाली, टॉन्सिल की सूजन

गले में सूजन और दर्द वाली गांठें महसूस होना

गले में खराश के साथ बुखार और सिरदर्द

मुश्किल भाषण और निगलने

ध्यान दें :

 जब तक स्थिति बहुत ज्यादा न हो तब तक टॉन्सिल को हटाने के लिए न जाएं

गंभीर और पुनरावृत्ति अक्सर होती है

गले में दर्द होने पर खारे पानी से गरारे करने से दर्द में आराम मिलता है

ऐसा भोजन लें जिसे आप सहन कर सकें। कोशिश करें और मामले में तरल पदार्थ लें

निगलते समय दर्द होता है

खूब सारे तरल पदार्थ और गर्म पेय पिएं

जब लक्षण परेशानी वाले हों तो बिस्तर पर जाएं।

स्वयं औषधि न करें:-

कारण जो भी हो, टॉन्सिलिटिस के सबसे खराब लक्षण 48 घंटों में समाप्त हो जाते हैं। यदि लक्षण 3 दिनों से अधिक समय तक बने रहते हैं और पीड़ित को हरे या पीले बलगम वाली खांसी होने लगती है, तो अपने नजदीक अच्छे होम्योपैथिक चिकित्सक से  सम्पर्क करें ।

नोट:-

दवा:- वैसिलिनम, बेराइटा कार्ब, सोरिनम, थूजा आदि अच्छी दवाएं हैं लेकिन दवा हमेशा चिकित्सक के सलाह से ही ले ।